06. रैदास – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. कवि ने अपनी तुलना ईश्वर से किस रूप में की है?

उत्तरः कवि अपने आराध्य को याद करते हुए उनसे अपनी तुलना करता है। उनका प्रभु हर तरह से श्रेष्ठ है तथा उनके मन में निवास करता है। हे प्रभु आप चंदन तथा हम पानी हैं। आपकी सुगंध मेरे अंग-अंग में बसी है। आप बादल हैं, मैं मोर हूँ। जैसे घटा आने पर मोर नाचता है, वैसे ही मेरा मन भी आपके स्मरण से नाच उठता है। जैसे चकोर प्रेम से चाँद को देखता है वैसे ही मैं आपको देखता हूँ। प्रभु आप दीपक हैं तो मैं उसमें जलने वाली बाती हूँ। जिसकी ज्योति दिन-रात जलती रहती है। प्रभु आप मोती हो तो मैं माला का धागा हूँ। जैसे सोने और सुहागे का मिलन हो गया हो, प्रभु आप स्वामी हैं मैं आपका दास हूँ। मैं सदा आपकी भक्ति करता हूँ।

प्रश्न 2. रैदास के प्रभु में वे कौन-सी विशेषताएँ हैं जो उन्हें अन्य देवताओं से श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं?
उत्तरः 

  • वे केवल झूठी प्रशंसा या स्तुति नहीं चाहते।
  • वे जाति प्रथा या छुआछुत को महत्व नहीं देते। वे समदर्शी हैं।
  • उनके लिए भावना प्रधान है। वे भक्त वत्सल हैं।
  • दीन दुखियों व शोषितों की विशेष रूप से सहायता करते हैं। वे गरीब नवाज हैं।
  • वे किसी से डरते नहीं हैं, निडर हैं।

प्रश्न 3. कवि रैदास ने अपने पद के माध्यम से तत्कालीन समाज का चित्रण किस प्रकार किया है?
उत्तरः 

  • कवि रैदास ने अपने पद ‘ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै’ में सामाजिक छुआछूत एवं भेदभाव की तत्कालीन स्थिति का अत्यंत मार्मिक एवं यथार्थ चित्र खींचा है।
  • उन्होंने अपने पद में कहा है कि गरीब एवं दीन-दुखियों पर कृपा बरसाने वाला एकमात्र प्रभु है। उन्होंने ही एक ऐसे व्यक्ति के माथे पर छत्र रख दिया है, राजा जैसा सम्मान दिया है, जिसे जगत के लोग छूना भी पसंद नहीं करते। समाज में निम्न जाति एवं निम्न वर्ग के लोगों को तिरस्कारपूर्ण दृष्टि से देखा जाता था, ऐसे समाज में प्रभु ही उस पर द्रवित हुए।
  • कवि द्वारा नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना, सैन आदि संत कवियों के दिए गए उदाहरण दर्शाते हैं कि लोग निम्न जाति के लोगों के उच्च कर्म पर विश्वास भी मुश्किल से करते थे। इसलिए कवि को उदाहरण देने की आवश्यकता पड़ी। इन कथनों से तत्कालीन समाज की सामाजिक विषमता की स्पष्ट झलक मिलती है।

प्रश्न 4. कवि रैदास अन्य कवियों जैसे नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना एवं सैन की चर्चा क्यों करते हैं?उत्तरः 

  • कवि रैदास का कहना है कि उच्च कोटि के संत जैसे-नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना एवं सैन निम्न वर्ण एवं निम्न वर्ग के सदस्य होते हुए भी ईश्वर की कृपा पाकर तर गए अर्थात् वे इस संसार रूपी भव सागर से पार हो गए। ठीक उसी प्रकार सभी संतों को, चाहे वे निम्न वर्ण एवं निम्नवर्ग के ही क्यों न हों, इस पर ध्यान देना चाहिए और ईश्वर की भक्ति एवं आराधना के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने के उपाय करने चाहिए।
  • वास्तव में ईश्वर अत्यधिक दयालु एवं सर्वशक्तिमान हैं और उनके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है। वह सब कुछ करने में समर्थ हैं, बस उनकी कृपा की आवश्यकता है। संत जनों को यही बताने के लिए कवि ने उपरोक्त संतों का नाम उदाहरण के रूप में दिया है।

प्रश्न 5. रैदास के पदों के माध्यम से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तरः रैदास के पदों से हमें यह संदेश मिलता है कि ईश्वर ही हर असंभव कार्य को संभव करने का सामथ्र्य रखता है। ईश्वर सदैव श्रेष्ठ और सर्वगुण सम्पन्न रहा है। अतः हमें उस भगवान की शरण में जाना चाहिए क्योंकि वही हमें इस संसार रूपी सागर से पार लगा सकता है। ईश्वर ने जात-पात, अमीर-गरीब के भेदभाव को न मानते हुए ऐसे-ऐसे अछूतों का उद्धार किया है जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया था। अतः हमें ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए।

05. शुक्र तारे के सामान – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1 विद्यार्थी अवस्था में महादेव भाई क्या करते थे ? महादेव भाई की साहित्यिक गतिविधियों में क्या देन है? बताइए।

उत्तरः महादेव भाई पहले सरकार के अनुवाद विभाग में नौकरी करते थे। 1917 में वे गाँधी जी के पास आए और उनके वैयक्तिक सहायक बन गए।
महादेव भाई को शिष्ट सम्पन्न भाषा और मनोहारी लेखन शैली की ईश्वरीय देन मिली थी। गाँधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ (मूल गुजराती) का अंग्रेजी अनुवाद महादेव भाई ने किया। टैगोर के नाटक ‘विदाई का अभिशाप’ और शरत बाबू की कहानियों का अनुवाद आपकी साहित्यिक देन है।

प्रश्न 2. ”अपना परिचय उनके पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर के रूप में देने में वे गौरवान्वित महसूस करते थे।“ का आशय स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः महादेव भाई का समूचा जीवन और उनके सारे कामकाज गाँधी जी के साथ एकरूप होकर इस प्रकार गुँथ गए थे कि गाँधी जी से अलग करके अकेले उनकी कोई कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वे गाँधी जी के लिए ही सारा काम करते थे। वे अत्यन्त विनम्र थे। अपनी बातों से किसी को ठेस नहीं पहुँचाते थे। वे स्वयं को गाँधी जी का भक्त, उनका खाना बनाने वाला, उनके लिए रास्ते पर पानी छिड़कने वाला तथा गधे के समान गाँधी जी के हर काम को करने के लिए तैयार रहने वाला कहकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे अर्थात् उन्हें अभिमान छू भी न सका था।

प्रश्न 3. महादेव जी के किन गुणों ने उन्हें सबका लाड़ला बना दिया?
उत्तरः महादेव को उनके निम्नलिखित गुणों ने सबका लाड़ला बना दिया था-
(i) महादेव गाँधी जी की यात्राओं के और प्रतिदिन की उनकी गतिविधियों के साप्ताहिक विवरण भेजा करते थे।(ii) वे गाँधी जी के खिलाफ लिखने वालों पर टिप्पणी करते थे।
(iii) बेजोड़ कलम, भरपूर, चैकसाई ऊँचे-से-ऊँचे ब्रिटिश समाचार पत्रों की परम्पराओं को अपनाकर चलने का गाँधी जी का आग्रह और कट्टर विरोधियों के साथ भी सत्यनिष्ठा, विनय से विवाद करने की गाँधी जी की तालीम आदि गुणों ने उन्हें सबका लाड़ला बना दिया था।

प्रश्न 4. गाँधी जी ने महादेव भाई को अपना वारिस कब घोषित किया तथा क्यों किया? स्पष्ट कीजिए
अथवा
गाँधीजी ने महादेव को अपना वारिस कब कहा था? 
उत्तरः महादेव 1917 ई. में गाँधी जी के पास आए थे। गाँधी जी ने उनके विशेष गुणों को तत्काल पहचान लिया और उन्हें अपने उत्तराधिकारी का पद सौंप दिया। सन् 1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के दिनों में पंजाब जाते समय गाँधी जी को पलवल स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। उसी समय उन्होंने महादेव को अपना वारिस कहा था।

प्रश्न 5. ”देश और दुनिया को मुग्ध करके शुक्र तारे की तरह अचानक अस्त हो गए।“ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः आकाश में अगणित तारे होते है, पर उनके बीच शुक्र तारा अलग ही अपनी चमक बिखेरता है। इसे चन्द्रमा का साथी माना गया है। शुक्र तारे की चमक का वर्णन कवियों द्वारा भी किया गया है। यह तारा कुल मिलाकर सुबह शाम में घंटे-दो-घंटे ही दिखता है, ठीक इसी तरह महादेव भाई भी स्वतंत्रता की प्रभात बेला में अपने कार्य एवं मधुर व्यवहार से लोगों के बीच लाड़ले बन गए थे। गाँधी जी के लिए वे सारे कार्य करते रहते थे। वे गाँधी जी तथा लोगों के दिलों में अपनी जगह बना चुके थे। उनकी असमय मृत्यु से विशेषकर गाँधी जी दुःखी थे। शुक्र तारे की तरह कम समय में ही अपने व्यवहार से सबको प्रभावित करते हुए अस्त हो गए।

प्रश्न 6. ”उन पत्रों को देख-देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वायसराय लम्बी साँस-उसाँस लेने लगते थे।“ आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः भारत में उनके अक्षरों का कोई सानी नहीं था। वायसराय के नाम जाने वाले गाँधी जी के पत्र हमेशा महादेव की लिखावट में जाते थे। बडे़-बड़े सिविलियन और गर्वनर कहा करते थे कि सारी ब्रिटिश सर्विसों में महादेव के समान अक्षर लिखने वाला कहीं खोजने पर नहीं मिलता था। महादेव भाई गाँधी जी को जो पत्र लिखते थे, उनके पास ऐसा व्यक्ति देखकर दिल्ली और शिमला में बैठे वायसराय लम्बी साँस लेते थे, क्योंकि उनके पास सुन्दर अक्षर लिखने वाला कोई लेखक नहीं था।

प्रश्न 7. ‘यंग इण्डिया’ और ‘नवजीवन’ नामक साप्ताहिक पत्रों से सम्बन्धित सारी व्यवस्था का कामकाज लेखक के कन्धों पर क्यों आ पड़ा ?
उत्तरः ‘यंग इण्डिया’ और ‘नवजीवन’ दोनों साप्ताहिक-पत्रों का काम बढ़ने पर गाँधी जी व महादेव भाई का अधिकांश समय देश भ्रमण में बीतने लगा, जिसकी वजह से सम्पादन सहित दोनों साप्ताहिकों की और छापाखाने की सारी व्यवस्था लेखक के जिम्मे आ पड़ी।

04. वैज्ञानिक चेतना के वाहक : चन्द्र शेखर वेंकटरमन – Long Question answer

प्रश्न 1: रामन् के आरंभिक शोधकार्य को लेखक ने आधुनिक हठयोग का उदाहरण क्यों कहा है?
उत्तर: 
कलकत्ता में सरकारी नौकरी के दौरान रामन् अपनी दिली इच्छा को तृप्त करने हेतु दफ़्तर से फ़ुर्सत पाते ही ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’ की प्रयोगशाला में शोधकार्य करते थे। हालाँकि वह प्रयोगशाला बड़ी मामूली-सी थी तथा वहाँ उपकरणों का भी अभाव था, किंतु दृढ़ इच्छाशक्ति की वजह से रामन् दफ़्तर का काम निपटाने के बाद बड़ी लगन और मेहनत से यहाँ शोधकार्य करते । इसी कारण लेखक ने उनके आरंभिक शोधकार्य को आधुनिक हठयोग का उदाहरण कहा है।

प्रश्न 2: रामन् ने विज्ञान के क्षेत्र में एक नई भारतीय चेतना को जाग्रत किया, कैसे?
उत्तर: 
रामन् प्रभाव की खोज से रामन् की गिनती विश्व के अग्रगण्य वैज्ञानिकों में होने लगी। उन्हें ‘सर’ की उपाधि, नोबेल पुरस्कार तथा ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भी उन्हें कई पदक तथा पुरस्कार मिले। उन्हें अधिकांश सम्मान उस दौर में मिले जब भारत अंग्रेज़ों का गुलाम था । उनके पुरस्कारों से भारत को नई पहचान, नया आत्मसम्मान तथा नया आत्मविश्वास मिला। उन्होंने एक नई भारतीय चेतना को जाग्रत किया।

प्रश्न 3: “उनके लिए सरकारी सुविधाओं से सरस्वती की साधना ही अधिक महत्त्वपूर्ण थी । ” स्पष्ट कीजिए-
उत्तर:
 चंद्रशेखर वेंकट रामण का मस्तिष्क बचपन से ही संसार के रहस्यों को सुलझाने के लिए बेचैन रहता था। बी.ए. और एम.ए. दोनों परीक्षाओं में उन्होंने ऊँचे अंक प्राप्त किए और शोधकार्यों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया। मगर उन दिनों शोध कार्य को व्यवसाय के रूप में लेने की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। शिक्षा समाप्त होने के बाद सुयोग्य छात्रों की भाँति रामन भी वित्त विभाग में अफसर बन गए। उस जमाने के प्रसिद्ध शिक्षा – शास्त्री आशुतोष मुखर्जी को जब इस प्रतिभावान युवक के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने उन्हें रिक्त हुए प्रोफ़ेसर के पद पर आने का सुझाव दिया। रामन के लिए यह कठिन निर्णय था। वे एक प्रतिष्ठित सरकारी पद पर थे जिसके साथ मोटी तनख्वाह और अनेक सुविधाएँ जुड़ीं थीं, लेकिन उनके लिए सरस्वती की साधना इन सबसे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थी इसलिए उन्होंने 1917 में कोलकाता के विश्वविद्यालय में नौकरी कर ली और वहाँ के शैक्षिक माहौल में अपना पूरा समय अध्ययन, अध्यापन और शोध कार्य में बिताने लगे। इस प्रकार ‘सरस्वती की साधना’ ही उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बनी।

प्रश्न 4: देश को वैज्ञानिक दृष्टि तथा चिंतन प्रदान करने में रामन् का क्या योगदान है ?
उत्तर: 
रामन् देश को वैज्ञानिक दृष्टि तथा चिंतन प्रदान करने हेतु पूर्णत: समर्पित थे। उनके द्वारा की गई खोज ‘रामन् प्रभाव’ भौतिकी के क्षेत्र में एक क्रांति के समान थी। उन्होंने बंगलोर में ‘रामन् रिसर्च इंस्टीट्यूट’ नामक अत्यंत उन्नत प्रयोगशाला और शोध संस्थान की स्थापना की। भौतिकी में शोधकार्यों को प्रेरित करने के लिए उन्होंने ‘इंडियन जनरल ऑफ़ फ़िज़िक्स’ नामक शोध-पत्रिका प्रारंभ की तथा सैकड़ों शोध छात्रों का मार्गदर्शन किया।

प्रश्न 5: यदि वैज्ञानिक विकास न हुआ होता तो हमारे देश की क्या स्थिति होती ?
उत्तर: 
यदि वैज्ञानिक विकास न हुआ होता तो हम अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए भी दूसरे देशों का मुँह ताकते। ऐसी स्थिति में हमारी स्थिति और भी दयनीय हो जाती । आधुनिक सुख-सुविधाओं से हम पूरी तरह वंचित रह जाते। शिक्षा, चिकित्सा तथा उद्योग क्षेत्रों में भी हम दूसरे देशों के सामने न टिक पाते। नवीन साधनों के अभाव में किसी भी समस्या का समाधान कर पाना संभव न होता। प्राकृतिक आपदाओं की भी स्थिति में अपने अस्तित्व को बचा पाना निश्चित रूप से कठिन होता।

03. तुम कब जाओगे, अतिथि – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. अतिथि को जाने के लिए लेखक ने किस-किस तरह से संकेत किया?
उत्तरः
 अतिथि को जाने के लिए लेखक ने कई तरह से संकेत दिए। लेखक अतिथि के सामने उसे दिखाकर तारीखें बदलता है। तारीखें बदलते समय वह इस बात को दोहराता है कि आज कौन-सी तारीख हो चुकी है। ऐसा करके वह अतिथि को जाने की याद दिलाना चाहता है। इसके अतिरिक्त उसने धोबी को कपड़े देने की अपेक्षा लाॅण्ड्री में कपड़े देने का सुझाव दिया जिससे कपड़े जल्दी धुलकर आ सकें। उसके द्वारा कहे गए ‘जल्दी धुल सकें’ वाक्य में यह भी संकेत था कि अतिथि को शीघ्र अपने घर लौट जाना चाहिए। लेखक ने अतिथि से अपनी नाराजगी दर्शाते हुए उससे गप्पें मारना और साथ में ठहाके लगाना बंद कर दिया। उनके बीच का सौहार्द बोझिल, बोरियत में परिवर्तित हो गया। घर में खाना ‘डिनर’ से चलकर ‘खिचड़ी’ पर आ गया। यह भी एक ठोस संकेत था, अतिथि को वापस भेजने का। इस तरह लेखक ने अतिथि को शीघ्र घर वापस जाने के लिए कई संकेत दिए।

प्रश्न 2. ”बातचीत की उछलती गेंद चर्चा के क्षेत्र के सभी कोनों से टप्पे खाकर फिर सेंटर में आकर चुपचाप पड़ी है“-आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः लेखक ने अतिथि से घर-परिवार, दोस्तों, नौकरी, राजनीति, फिल्म, साहित्य, परिवार नियोजन, महँगाई और पुरानी प्रेमिकाओं तक के विषय में काफी बातें कर ली थीं। अब उनके सारे विषय खत्म हो चुके थे। बातचीत रूपी गेंद विषय रूपी कमरे के सारे कोनों को छू आई थी और अब वह शांत पड़ी थी। इस सबका कारण अतिथि का लेखक के घर लंबे समय तक रुकना था। लेखक को लगने लगा था कि यदि अतिथि का मन बातों में ज्यादा ही रम गया तो वह और जम जाएगा और फिर एक ही बात करते-करते उसे बोरियत भी होने लगी थी। इसलिए उनकी बातचीत पर विराम लगा हुआ था। यदि अतिथि समय से खुशी-खुशी चला जाता, तो यह स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होती।

प्रश्न 3. “मेरे अतिथि, मैं जानता हूँ कि अतिथि देवता होता है, पर आखिर मैं भी मनुष्य हूँ। मैं कोई तुम्हारी तरह देवता नहीं। एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते। देवता दर्शन देकर लौट जाता है। तुम लौट जाओ अतिथि” का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
 यदि अतिथि थोड़ी देर तक टिकता है तो वह देवता रूप बनाए रखता है, फिर वह मनुष्य रूप में आ जाता है, और ज्यादा देर तक टिकने पर वह राक्षस का रूप ले लेता है। तब वह राक्षस जैसा बुरा प्रतीत होता है। जब अतिथि तीसरे दिन भी नहीं गया और धोबी से कपड़े धुलाने की बात कहने लगा तो इससे मेहमान के कई दिन और रुकने की सम्भावना हो गई। इसके बाद लेखक अतिथि को देवता न मानकर मानव तथा राक्षस मानने लगा था। उसका अतिथि राक्षस का रूप लेता जा रहा था। भावनाएँ भी अपशब्दों का रूप धारण कर लेती है। मेजबान को गेट आउट तक कहने को विवश होना पड़ा। अतिथि के जल्दी घर जाने में ही उसका देवत्व सुरक्षित है क्योंकि एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर तक साथ नहीं रह सकते।

मनुष्य देवता-स्वरूप अतिथि का आदर सत्कार अधिक दिन तक नहीं कर सकता क्योंकि इस महँगाई के दौर में मनुष्य-रूप में देवता का आदर-सत्कार करते-करते उसके घर का बजट बिगड़ जाता है। आज के समय में अपना परिवार पालना भी कठिन होता है, वहाँ अतिथि का खर्च उठाना पड़े तो मनुष्य का चैन उड़ना स्वाभाविक है।

प्रश्न 4. जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए? क्या यह परिवर्तन सही थे?’ अतिथि तुम कब जाओगे?’ पाठ के आधार पर लिखिए।
अथवा
अतिथि के सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ ?
उत्तरः जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो उसकी आवभगत में कमी आई। लेखक के व्यवहार में परिवर्तन आ गया। सौहार्द धीरे-धीरे बोरियत में बदल गया। शब्दों का लेन-देन मिट गया और चर्चा के विषय खत्म हो गए। बढ़िया लंच और डिनर ने खिचड़ी का स्थान ले लिया। लेखक को अतिथि थोड़ा-थोड़ा राक्षस प्रतीत होने लगा। यहाँ तक कि लेखक का मन उसे गेट आउट कहने को करने लगा। अतिथि के कई दिन तक रुकने पर घर का बजट बिगड़ जाता है। महँगाई के जमाने में जब अपना परिवार पालना कठिन होता है तब अतिथि का खर्च उठाते-उठाते मेहमान के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आना स्वाभाविक है।

प्रश्न 5. ‘अतिथि देवो भवः’ उक्ति की व्याख्या पर आधुनिक युग के सन्दर्भ में इसका आंकलन प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः अतिथि देवता के समान होता है। यह कथन पहले के समय में सार्थक था किन्तु आधुनिक युग में यह चरितार्थ नहीं होता है। आज लोगों के पास अपने लिए ही समय नहीं है। वे अतिथियों को कैसे समय दें? आज के लोग कमाने में, अपना भविष्य बनाने में, पढ़ने-पढ़ाने में अधिक ध्यान देने लगे हैं। अतः अब अतिथि के आने पर उनकी खुशी बढ़ती नहीं, बल्कि कम होती है। अतिथि के आने की खबर सुनकर ही चैन उड़ जाता है क्योंकि उसके आने की खबर के साथ ही जेहन में सवाल उठने लगते हैं कि कहाँ उन्हें ठहराया जाएगा? खाने में क्या-क्या बनाना होगा? आदि सवाल अतिथि के आने के पहले ही परेशान करने लगते हैं।

02. एवरेस्ट: मेरी शिखर यात्रा – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. एवरेस्ट जैसे महान अभियान में खतरों को और कभी-कभी तो मृत्यु को भी आदमी को सहज भाव से स्वीकार करनी चाहिए। आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः शेरपा कुलियों में से एक की मृत्यु व चार के घायल होने की खबर सुन यह कथन कर्नल खुल्लर ने कहा। एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊँची चोटी है और इस पर चढ़ना कोई आसान काम नहीं है। इसलिए कर्नल खुल्लर ने अभियान दल के सभी सदस्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए खतरों का सामना करना पड़ता है और मृत्यु को भी गले लगाना पड़ सकता है। इस तरह की परिस्थितियों का सहज भाव से सामना करना चाहिए। मृत्यु इस उद्देश्य के सामने छोटी है।

प्रश्न 2. ‘एवरेस्ट: मेरी शिखर यात्रा’ पाठ में उपनेता प्रेमचंद ने किन परिस्थितियों से अवगत कराया
उत्तरः अभियान दल के उपनेता प्रेमचन्द अग्रिम दल का नेतृत्व कर रहे थे। वे 26 मार्च को पैरिच लौट आए और आकर उन्होंने पहली बड़ी बाधा खुंभु हिमपात की स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि कैम्प-एक 6000 मीटर ऊपर है, जो हिमपात के ठीक ऊपर ही है। वहाँ तक जाने का रास्ता साफ कर दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि पुल बनाकर, रस्सियाँ बाँधकर तथा झाँड़ियों से रास्ता चिह्नित कर सभी बड़ी बाधाओं का जायजा ले लिया गया है। और यह भी बताया कि ग्लेशियर बर्फ की नदी है और अभी बर्फ का गिरना जारी है। हिमपात के कारण सारा काम व्यर्थ भी हो सकता है तथा हमें रास्ता खोलने का काम दोबारा भी करना पड़ सकता है।

प्रश्न 3. हिमपात किस तरह होता है और उससे क्या-क्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तरः हिमपात में बर्फ गिरती है। कभी-कभी बर्फ के भारी टुकड़े भी गिरते हैं। हिमपात अनिश्चित और अनियमित होता है। इससे अनेक प्रकार के परिवर्तन आते रहते हैं। ग्लेशियर के बहने से अक्सर बर्फ में हलचल हो जाती है जिससे बर्फ की चट्टानें तत्काल गिर जाती हैं। इससे धरातल पर दरारें पड़ जाती हैं और यह दरारें-चैड़े हिम-विदर में बदल जाती हैं। कभी-कभी स्थिति खतरनाक रूप धारण कर लेती है।

प्रश्न 4. सम्मिलित अभियान में सहयोग एवं सहायता की भावना का परिचय बछेन्द्री को किस कार्य से मिलता है?
अथवा
बिना सहयोग एवं सहायता की भावना से सम्मिलित अभियान संभव नहीं है। लेखिका बछेन्द्री पाल ने ऐसा क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः (i) एक सम्मिलित अभियान की सफलता सभी के सहयोग पर आधारित होती है।
(ii) सहयोग के आधार पर सामान्य-सा व्यक्ति भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकता है।
(iii) बछेन्द्रीपाल ने स्वयं यह करके दिखाया हैμअपने व्यवहार से सहयोग की भावना का परिचय दिया है।
(iv) उसने जब देखा कि उसके साथ जय और मीनू कैंप तक नह° पहुँचे हैं तो उनके लिये चाय जूस बनाया तथा मार्ग में ही जा पहुँची, जबकि उस रास्ते पर जाना कठिन और खतरनाक था।
(v) सहयोग के आधार पर ही उपनेता प्रेमचन्द, डाॅ. मीनू मेहता, लोपसांग तथा अंगदोरजी बड़ी-बड़ी भूमिकाओं का निर्वाह कर रहे थे। अतः बछेन्द्री पाल का यह कथन सर्वथा उपयुक्त है।

प्रश्न 5. मई की रात को कैंप तीन में क्या घटना घटी और एक अन्य साथी ने लेखिका की जान कैसे बचाई?
उत्तरः 15-16 मई, 1984 को बुद्धपूर्णिमा के दिन जब लेखिका ल्होत्से की बर्फीली सीधी ढलान पर सुन्दर नाइलाॅन के बने तंबू के कैंप तीन में गहरी नींद में सोई हुई थी तभी रात में लगभग 12:30 बजे उसके सिर के पिछले हिस्से में एक जोरदार धमाके के साथ कोई सख्त चीज टकराई। वह बर्फ का बड़ा विशालकाय पुंज था। जिसने कैंप को तहस-नहस करने के साथ सभी व्यक्तियों को चोटिल किया। लेखिका तो बर्फ के नीचे फंस गयी थी।
तभी लोपसांग अपनी स्विस छुरी की मदद से उनके तंबू का रास्ता साफ करने में सफल हो गया तथा उसने ही लेखिका के चारों तरफ के कड़े जमे बर्फ की खुदाई कर लेखिका को बर्फ की कब्र से बाहर खींच कर निकाला। इस तरह लेखिका की जान बची।

प्रश्न 6. लेखिका के तम्बू में गिरे बर्फ-ञपड का वर्णन किस तरह किया गया है? 

उत्तरः लेखिका के तम्बू में गिरे बर्फ पिंड का वर्णन इस प्रकार किया है-
15-16 मई, 1984 को बुद्धपूर्णिमा की रात लगभग 12ः30 बजे लेखिका के कैम्प-तीन के नायलाॅन के तम्बू के ऊपर एक भारी बर्फ ञपड आ गिरा। यह लेखिका के सिर के पिछले हिस्से से टकराया। उसकी नींद खुल गई। यह बर्फ पिण्ड कैम्प के ठीक ऊपर ल्होत्से ग्लेशियर से टूटकर नीचे आ गिरा। उसका विशाल हिमपुंज बन गया था। हिमखण्डों, बर्फ के टुकड़ों तथा जमी हुई बर्फ के इस विशालकाय पुंज ने एक एक्सप्रेस रेलगाड़ी की तेजगति और भीषण गर्जना के साथ, सीधी ढलान से नीचे आते हुए कैम्प को तहस-नहस कर दिया था। इससे प्रत्येक व्यक्ति को चोट तो लगी, पर मरा कोई नहीं।

प्रश्न 7. एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए कुल कितने कैंप बनाए गए? उनका वर्णन कीजिए।
अथवा
एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए बनाए गए कैपों का वर्णन कीजिए। 
उत्तरः एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए निम्नलिखित छह कैम्प बनाए गए थे-
(i) बेस कैम्प-यहाँ से असली चढ़ाई शुरू होनी थी। यहाँ सारी सुविधाएँ एकत्रित की गई थी। यहाँ तेनजिंग भी मिलने आए थे।
(ii) कैम्प-एक– इस कैम्प में लेखिका और एक अन्य महिला पहले पहुँची।
(iii) कैम्प-दो -16 मई को प्रातः सभी लोग इस कैम्प पर पहुंचे। जिसमें एक शेरपा की टाँग टूट गई थी, उसे स्ट्रेचर पर लिटाया गया।
(iv) कैम्प-तीन-इसमें 10 व्यक्ति थे। यह नायलाॅन से बना तम्बू था। वहीं रात 12ः30 बजे बर्फ का खण्ड टूटकर आ गिरा था।
(v) कैम्प-चार-यह कैम्प 29 अप्रैल, 1948 को अंगदोरजी, लोपसाँग और गगन बिस्सा ने 7900 मीटर की ऊँचाई पर लगाया।
(vi) शिखर कैम्प-इस मैदान में लेखिका और अंगदोरजी केवल दो घण्टों में पहुँच गये यहाँ से सागरमाथा नजदीक था।

प्रश्न 8. एवरेस्ट की शिखर यात्रा में किन-किन लोगों ने लेखिका बछेन्द्री पाल को सहयोग दिया?
उत्तरः एवरेस्ट की शिखर यात्रा में अभियान दल के नेता कर्नल खुल्लर, उपनेता प्रेमचंद, साथी अंगदोरजी तथा डाॅक्टर मीनू मेहता ने लेखिका को सफलता प्राप्त करने में उल्लेखनीय सहयोग दिया। कर्नल खुल्लर ने लेखिका को शिखर यात्रा के प्रारंभ से लेकर अंत तक हिम्मत बँधायी, उसका साहस बढ़ाया। उन्होंने अभियान दल के सभी सदस्यों की मृत्यु को सहजता से स्वीकार करने का पाठ पढ़ाकर उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त किया। उपनेता प्रेमचंद ने पहली बाधा खुंभु हिमपात की स्थिति से उन्हें अवगत कराया और सचेत किया कि ग्लेशियर बर्फ की नदी है तथा बर्फ का गिरना जारी है। अतः सभी लोगों को सावधान रहना चाहिए। डाॅक्टर मीनू मेहता ने एल्युमीनियम की सीढ़ियों से अस्थायी पुल बनाने, लट्ठों एवं रस्सियों का उपयोग, बर्फ की आड़ी-तिरछी दीवारों पर रस्सियों को बाँधना आदि सिखाया। अंगदोरजी ने लेखिका को लक्ष्य तक पहुँचने में सहयोग दिया तथा प्रोत्साहित भी किया।

01. दुःख का अधिकार – Long Question answer

निबन्धात्मक प्रश्न

(प्रत्येक 5 अंक)

प्रश्न 1. जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देती, उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है। आशय स्पष्ट करिए।
उत्तरः आशय-पतंग डोर से बंँधी होती है। डोर के हिसाब से उसे नियंत्रित किया जाता है। जब डोर से पतंग अलग हो जाती है, तब वह हवा के झोंकों के सहारे तैरती हुई उड़ती है। डोर के अलग हो जाने के बाद भी हवा के कारण अचानक ही धरती पर नहीं आ जाती है। समाज में व्यक्ति अपने परिवार और आर्थिक स्तर की डोर से बँधा होता है। वह इन्हें से नियंत्रित होता है। जब अपनी पढ़ाई-लिखाई और संवेदना के विकास के साथ व्यक्ति इन डोरों से अलग तो हो जाता है फिर भी समाज की हवा यानि पोशाक आदि बाहरी प्रभावों के कारण वह तत्काल आम आदमी या गरीब आदमी से जुड़ नहीं पाता है। लखेक भी झुककर यानि हर तरह से गरीब वर्ग के साथ मिलना-जुलना चाहता है, लेकिन उसकी पोशाक इस विचार और व्यवहार में बाधक बनती है।

प्रश्न 2. वृद्धा का बाजार में खरबूजे बेचना, वहाँ खड़े लोगों को बेहयाई क्यों लगी?
उत्तरः हमारी सामाजिक मान्यता है कि घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर तेरह दिन का शोक मनाया जाता है। इन दिनों सूतक माना जाता है। इन वर्जित दिनों के दौरान ही बेटे की मृत्यु के अगले दिन ही बुढ़िया मजबूर होकर खरबूजे बेचने को चली गयी। तो जात-पात, ऊँच-नीच की भावनाओं वाले लोगों को बुढ़िया की मजबूरी उसकी बेहयाई लगी। वे उस पर व्यंग्य करने लगे और तरह-तरह की बातें करने लगे।

प्रश्न 3. ज़िंदा आदमी नंगा रह सकता है, परन्तु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए आशय स्पष्ट कीजिए
उत्तरः कथन द्वारा समाज में व्याप्त अंध-विश्वास व कुरीतियों पर प्रहार किया गया है। समाज में जीवित व्यक्ति की कद्र नहीं होती पर मृतक को नए कपड़े पहनाकर ही विदा किया जाता है। व्यक्ति चाहे जीवन भर अभावग्रस्त रहे परन्तु किसी के मरने पर अंतिम संस्कार में रीति रिवाजों का पालन करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। भले ही वह यह भार उठाने में सक्षम हो या नहीं, चाहे इसके लिए घर की स्त्रियों को अपने गहने ही क्यों न बेचने पड़ें।

प्रश्न 4. पाठ के आधार पर बताइए कि शोक के समय धनी और निर्धन की दशा में क्या अंतर होता है
उत्तरः शोक के समय धनी और निर्धर दोनों ही दुःख में डूब जाते हैं। दोनों को इसकी अनुभूति भी समान होती है। फिर भी दोनों के दुःख की अभिव्यक्ति में पर्याप्त अन्तर होता है। गरीब व्यक्ति अधिक समय तक शोक नहीं मना सकता क्योंकि उसके पास कोई एकत्र धन नहीं है जिसे वह दुःख के समय खर्च कर गुजारा चला सके। उसे तो अपना परिवार पालने के लिए रोजी-रोजगार की तलाश में जाना ही पड़ता है। जबकि अमीर व्यक्ति के पास सब सुख-सुविधाएँ होती हैं, सेवा करने वाले मौजूद होते हैं उसे कोई चिन्ता या मजबूरी नहीं होती अतः उन दोनों की दशा में बहुत अंतर होता है।

प्रश्न 5. इस कहानी में लेखक ने हमारी किन कुरीतियों और कुसंस्कारों की ओर संकेत किया है?
उत्तरः लेखक ने इस कहानी में समाज की कुछ कुरीतियों की ओर संकेत किया है। जैसे-यदि किसी के यहाँ मृत्यु का सूतक (पातक) हो तो उसे काम नहीं करना चाहिए। उसके हाथ से चीज भी नहीं खरीदनी चाहिए क्योंकि उसके स्पर्श से वस्तु दूषित हो जाती है, और खाने वाले का ईमान-धर्म नष्ट हो जाता है।
लेखक ने समाज के इस कुसंस्कार का भी संकेत किया है कि झाड़-फूँक करने वाले ओझा को पूजा के नाम पर बहुत दान-दक्षिणा दे दी जाती है, भले ही घर में कुछ भी शेष न रहे।
इसी प्रकार हाथ के गहने तक बेचकर मुर्दे के लिए कफन खरीदना पडे़ इसे भी लखेक कुरीति मानता है वेसै गरीब विवश लोगों के प्रति घृणा की भावना और उन्हें नीच या कमीना कहना स्वयं में एक बहुत बड़ा कुसंस्कार है। इसका संकेत भी लेखक ने दिया है।

प्रश्न 6. बुढ़िया के दुःख तथा संभ्रांत महिला के दुःख में क्या अंतर है?
अथवा
पुत्र-वियोगिनी बुढ़िया माँ और संभ्रांत महिला के दुःखों की तुलना कीजिए।
अथवा
भगवाना की माँ और संभ्रांत महिला के दुःखों की तुलना कीजिए।
उत्तरः भगवाना की माँ अत्यंत गरीब एवं मेहनतकश महिला है। रोज कमाने और रोज खाने वाली भगवाना की माँ का परिवार आर्थिक तंगी के दौर से निरंतर गुजरता रहता है। उसके बेटे भगवाना की आकस्मिक मौत ने उसे पूरी तरह हिलाकर रख दिया। अंधविश्वास के कारण आधुनिक चिकित्सा के अभाव ने उसके बेटे भगवाना की जान ले ली, लेकिन इकलौते बेटे की मृत्यु से जड़-सी बन चुकी भगवाना की माँ के सामने और भी दायित्व खड़े थे।
घर में अनाज का दाना नहीं होने से भूख से बिलबिलाते बच्चे एवं बुखार से तपती बहू की जान की परवाह उसे ही करनी थी। इसलिए उसके पास अपने इकलौते बेटे की मृत्यु का दुःख मनाने का अवसर नहीं है। वह अंदर से कलपती है, लेकिन उसे स्वयं पर नियंत्रण रखकर घर की जिम्मेदारी निभानी है।
दूसरी तरफ अपने बेटे की मृत्यु के बाद एक संभ्रांत महिला महीनों तक बिस्तर पकड़े रहती है। बेटे की मृत्यु ने उसे शोक संतप्त कर दिया है और वह अपने होश को सँभाल नहीं पा रही है, उसकी तीमारदारी में दो-दो डाॅक्टर लगे हुए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि हर माँ का दिल अपने बेटे के प्रति पे्रेम एवं ममता लिए एक जैसा ही होता है, लेकिन इससे ज्यादा कड़वी सच्चाई यह भी है कि समय एवं परिस्थिति मनुष्य को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखा देती है। संभ्रांत महिला के सामने भगवाना की माँ की तरह अपने परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी नहीं है। उसके घर में भूख से बिलबिलाते बच्चे एवं बुखार से तपती बहू नहीं है और वह घर की जिम्मेदारी उठाने वाली एकमात्र सदस्या नहीं है। इसलिए उसे अपना दुःख मनाने का अवसर प्राप्त हो जाता है, जिसका भगवाना की माँ के पास घोर अभाव है।

प्रश्न 7. यशपाल जी की कहानी ‘दुःख का अधिकार’ में दुख मनाने का अधिकार सबको क्यों नहीं है
अथवा
‘दुःख मनाने का भी एक अधिकार होता है।’ टिप्पणी कीजिए।
उत्तरः दुःख मनाने का अधिकर केवल अमीर व्यक्तियों को है। गरीब आदमी दुःखी होकर भी दुःख मनाने का अवसर नहीं पाता क्योंकि उसे विवशतः मजदूरी करनी पड़ती है। दुःखों को सहन करना पड़ जाता है।
व्याख्यात्मक हल:
दुःख की अनुभूति समाज का प्रत्येक वर्ग करता है परन्तु दुःख मनाने का अधिकार सबको नहीं है वह केवल सम्पन्न वर्ग को ही  प्राप्त है क्योंकि उसके पास शोक मनाने के लिए सहूलियत भी है और समय भी। गरीब वर्ग की विवशता न तो उन्हें दुःख मनाने की सुविधा प्रदान करती है न अधिकार। वे तो अपने परिवार के पालन पोषण के लिए रोजी-रोटी की उलझन में ही उलझे रहते हैं। अतः दुःख मनाने का भी एक अधिकार होता है।

प्रश्न 8. ‘दुःख का अधिकार’ कहानी से स्पष्ट होता है कि ‘पैसे की कमी और अभाव आदमी को दुःख मनाने का अवसर भी नहीं देते’-कैसे और क्यों? 
उत्तरः कहानी में खरबूजे बेचने वाली के बेटे की मृत्यु हो जाती है। किन्तु पैसे की कमी, बच्चों का भूख से बिलबिलाना, बहू का तेज बुखार से पीड़ित होना देख बुढ़िया अपने शोक को भूलकर खरबूजे बेचने के लिए विवश हो जाती है। वह बाजार में मुँह छिपाए, सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफक कर रोती है। इस तरह पुत्र शोक से पीड़ित माँ को अभावों ने दुःख मनाने की फुर्सत भी नहीं दी।

प्रश्न 9. शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और….दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा? पाठ ‘दुःख का अधिकार’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
आशय स्पष्ट कीजिए-शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और….दुखी होने का भी एक अधिकार होता है।

उत्तरः लेखक के अनुसार दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है। उसका इस तरह से कहना उचित ही है। बुढ़िया और संभ्रात महिला का दुःख समान है। दोनों के पुत्र की मृत्यु हुई है परंतु बुढ़िया की बहू तेज बुखार से पीड़ित है। बच्चे भूख से बिलख रहे हैं और पैसों की कमी है। इन सब कारणों से उसे शोक करने, गम मनाने का भी अवसर नहीं मिला और वह अपने बेटे की मृत्यु के दूसरे दिन ही अपने शोक को भूलकर खरबूजे बेचने चल दी। जबकि संभ्रात महिला को उसके बेटे की मृत्यु के बाद दुःख मनाने के लिए सभी सहूलियत मिली। शोक संतप्त होने पर वह अपने होश नहीं संभाल पा रही थी। इसलिए दो-दो डाक्टर उसकी तीमारदारी में लगे हुए थे। वह महीनों बिस्तर पर पड़ी रहती है, क्योंकि उसके सामने परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी नहीं थी।
यहाँ हम समझ सकते हैं कि हर माँ के दिल में अपने बेटे के प्रति प्रेम, ममता समान होती है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण गरीब बुढ़िया को शोकग्रस्त होने के बावजूद भी दुःखी होने का अधिकार नहीं मिल पाया, जबकि संभ्रात महिला को अपनी सहूलियतों के कारण दुःख मनाने का अधिकार मिल गया। कड़वी सच्चाई यह है कि समय और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना ही पड़ता है।

प्रश्न 10. इस पाठ का शीर्षक ‘दुःख का अधिकार’ कहाँ तक सार्थक है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
 इस पा. का शीर्षक ‘दुःख का अधिकार’ सटीक एवं सार्थक है। लेखक यह कहना चाहता है कि यद्यपि दुःख प्रकट करना हर व्यक्ति का अधिकार है। परन्तु हर कोई ऐसा कर नहीं सकता। एक ओर सम्पन्न महिला है और उस पर कोई जिम्मेदारी नहीं है। उसके पास पुत्र-शोक मनाने के लिए डाॅक्टर हैं, सेवा-कर्मी हैं, साधन हैं, धन है, समय है। परन्तु गरीब लोग अभागे हैं, वे चाहे तो भी शोक प्रकट करने के लिए आराम से दो आँसू नह° बहा सकते। उनके सामने खड़ी भूख, गरीबी और बीमारी नंगा नाच करने लगती है। अतः दुःख प्रकट करने का अधिकार गरीबों को नहीं है।

10. नए इलाके में… खुशबू रचते हैं हाथ… – Previous year question

Very Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: खुशबू रचने वालों को गंदे मुहल्ले के गंदे लोग क्यों कहा गया है? [2025]
उत्तर: 
खुशबू रचने वालों को, गंदे मुहल्ले के गंदे लोग इसलिए कहा जाता है कि खुशबू रचने वाले लोग गन्दे मुहल्लों में रहते हैं और स्वयं भी गन्दे होते हैं।

प्रश्न 2: बच्चों के हाथों को किसके समान बताया गया है? [2025]
उत्तर:
 बच्चों के हाथों को ‘जुही की कली की डाल’ के समान नाजुक व खुशबूदार बताया गया है।

प्रश्न 3: खुसबू रचते हैं हाथ शीर्षक कविता का मूल भाव लिखिए। [2024]
उत्तर:
 इस कविता को लिखने के पीछे कवि का उद्देश्य समाज के निचले तबके द्वारा किया जा रहा उत्कृष्ट कार्य प्रकाश में लाना है। कवि सामाजिक और आर्थिक विषमता के प्रति हमें सचेत और जागरूक करना चाहते हैं।

प्रश्न 4: ‘पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ’ किसके हैं ?  [2023]
उत्तर:
 ‘पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ’ बच्चों के हैं। 

प्रश्न 5: यह दुनिया कितने समय में पुरानी पड़ जाती है? [2022]
उत्तर:
 यह दुनिया एक दिन में पुरानी पड़ जाती है।

प्रश्न 6: गली में क्या- क्या बनता है? [2022]
उत्तर:
 उत्तर-गली में मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ बनती हैं। यहाँ केवड़ा, गुलाब, खस और रातरानी अगरबत्तियों का निर्माण होता है।

प्रश्न 7: जो लोग खुशबू रचते हैं, उनके हाथ कैसे होते हैं? [2021]
उत्तर: 
खुशबू रचने वाले हाथों की नसें उभरी होती हैं, उनके नाखून घिसे होते हैं। उनके हाथ गंदे, कटे-पिटे तथा जख्मी होते हैं।

Short Answer Type Questions

प्रश्न 1. नए बसते इलाके में कवि रास्ता क्यों भूल जाता है? [2025]
उत्तर: नए निर्माण होते इलाके में कवि के रास्ता भूलने का कारण हैμइन इलाकों में हर रोज नए-नए निर्माण होना, नए इलाके बसना तथा बनाए गए निशानों का न मिलना। अर्थात् कवि नए परिवर्तन के कारण रास्ता भूल जाता है। 

प्रश्न 2. कवि नए शहर में अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए किन-किन निशानों को खोजता है ? [2024]
उत्तर: 

  • पीपल का पेड़
  • ढहा हुआ घर
  • जमीन का खाली टुकड़ा/बिना रंग वाला लोहे का फाटक 

व्याख्यात्मक हल:
कवि नए शहर में अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए पीपल का पेड़, ढहा हुआ मकान, जमीन का खाली टुकड़ा, बिना रंग वाला लोहे का फाटक, एक मंजिल मकान के निशान को खोजता है।

प्रश्न 3. मुल्क की मशहूर अगरबत्तियाँ कहाँ बनती हैं ? [2023]
उत्तरः देश की मशहूर खुशबूदार अगरबत्तियाँ जहाँ बनती हैं, वहाँ गन्दगी होती है। ये अगरबत्तियाँ चारों तरफ बदबू से भरी बस्तियों तथा कूड़े के ढेर वाली गलियों में बसे गंदे मोहल्लों में बनती है।

प्रश्न 4. जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं, वहाँ का माहौल केसा होता है? [2023]
उत्तरः जहाँ अगरबत्तियाँ बनती हैं वहाँ माहौल अत्यन्त गन्दा होता है। सुगन्धित अगरबत्तियाँ बनाने वाले लोग गन्दे मोहल्लों में रहते हैं। ये लोग स्वयं भी गन्दे होते हैं तथा दुनिया-भर की गन्दगी के बीच रहते हैं। वहाँ का माहौल रहने योग्य नहीं होता पर वहाँ रहना इनकी मजबूरी है।

प्रश्न 5. ‘पीपल के पत्ते से नए-नए हाथ’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है ? [2022]
उत्तरः कवि उन बच्चों के बारे में कहना चाहता है जिनके हाथ पीपल के नए-नए पत्तों की तरह कोमल होते हैं तथा अगरबत्ती बनाते-बनाते उनके हाथों की कोमलता एवं सुगन्ध गायब हो जाती है।


Long Answer Type Questions

प्रश्न 1. इस कविता में कवि ने शहरों की किस विडम्बना की ओर संकेत किया है ? [2025]
उत्तरः
 इस कविता में कवि ने शहरों की इस विडम्बना की ओर संकेत किया है कि वहाँ के लोगों के पास समय का सदा अभाव रहता है। वहाँ कोई किसी से जान-पहचान रखना नहीं चाहता। दरवाजा खटखटाने पर भी कोई किसी की सहायता करने को तैयार नहीं होता। वहाँ अब पूर्व परिचितों का अकाल-सा पड़ गया है। वहाँ सभी अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते हैं। शहरों में पड़ोसी-पड़ोसी को नहीं पहचानता। न उनमें कोई पे्रेम भावना तथा स्नेह होता है। 

प्रश्न 2. व्याख्या कीजिए-  [2024]
(क)यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
उत्तरः कवि परिवर्तन के दौर की विशेषता का उल्लेख करते हुए कहता है कि अब जीवन को स्मृति के सहारे नहीं जिया जा सकता। अब वह कई बार धोखा दे जाती है। यह दुनिया रोज नए रंग बदलती है। यह एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।
(ख) समय बहुत कम है तुम्हारे पास
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास

शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देखकर

उत्तरः व्यक्ति के पास समय का अभाव है। नई परिस्थितियों में सभी काम में व्यस्त हैं। रोज नए परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे बदलते वातावरण में भी आशा की एक किरण अवश्य रहती है कि सम्भवतः कोई ऊपर से देखकर पहचान कर पुकार ले।

प्रश्न 3. ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ कविता में कवि ने समाज की किस विसंगति पर कटाक्ष किया है ? [2022]

उत्तरः ‘खुशबू रचते हैं हाथ’ कविता ने समाज के निर्माण में योगदान करने वाले लोगों के साथ होने वाले उपेक्षा भाव को बेनकाब किया है। जो वर्ग समाज में सौंदर्य की सृष्टि कर रहा है और उसे खुशहाल बना रहा है, वही वर्ग अभाव में, गंदगी में जीवन बसर कर रहा है। लोगों के जीवन में सुगंध बिखेरने वाले हाथ भयावह स्थितियों में अपना जीवन बिताने पर मजबूर हैं। खुशबू रचने वाले हाथ सबसे गंदे और बदबूदार इलाकों में जीवन बिता रहे हैं-यह कैसी सामाजिक विषमता एवं विडम्बना है।

प्रश्न 4ः निम्नलिखित काव्यांश में निहित काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए- [2021]
पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ
जूही की डाल -से खुशबूदार हाथ
गंदे कटे-पिटे हाथ
जख्म से फटे हुए हाथ
उत्तरः इन काव्य-पंक्तियों में अगरबत्ती बनाने वाले विभिन्न लोगों के बारे में हाथों के माध्यम से बताया गया है। इनमें कुछ नए बालक भी शामिल हैं। इन बालकों के हाथों को पीपल के नए पत्तों के समान कोमल बताया गया है। इन बच्चों के हाथ जुही की डाल की सुगंध लिए हुए होते हैं पर कुछ दिनों में काम करते-करते ये हाथ कट-फट जाते है तथा जख्मी तक हो जाते है। बालकों के साथ हो रहे अन्याय का मार्मिक चित्रण है। हाथ की उपमा पीपल के पत्ते से दी गई है अतः उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग है। जूही डाल से खुशबूदार हाथ में उपमा अलंकार है। भाषा सरल, सजीव है। 

09. अग्नि पथ – Previous year question

Very Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: घने वृक्षों को खड़े देखकर भी मनुष्य के मन में किन भावों का उदय नहीं होना चाहिए। [2025]
उत्तर: 
घने वृक्षों को खड़े देखकर मनुष्य के मन में कुछ पल आराम करने की बात मन में आती है। कवि नहीं चाहता कि संघर्षशील मानव के मन में आराम की इच्छा जागृत हो।

प्रश्न 2: घने वृक्ष और एक पत्र-छाँह का क्या अर्थ है? अग्निपथ कविता के अनुसार लिखिए। [2024]
उत्तर:
 ‘घने वृक्ष’ मार्ग में मिलने वाली सुविधा के प्रतीक हैं। इनका आशय है-जीवन की सुख-सुविधाएँ। ‘एक पत्र-छाँह’ का प्रतीकार्थ है-थोड़ी-सी सुविधा।

प्रश्न 3: अग्निपथ में क्या नहीं माँगना चाहिए? [2024]
उत्तर:
 ‘अग्निपथ’ अर्थात् – संघर्षमयी जीवन में हमें चाहे अनेक घने वृक्ष मिलें, परंतु हमें एक पत्ते की छाया की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। किसी भी सहारे के सुख की कामना नहीं करनी चाहिए।


प्रश्न 4: ‘चल रहा मनुष्य है। अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, पथपथ। पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।’ [2023]
उत्तर:
 इस पंक्ति में कवि दर्शाता है कि मनुष्य जीवन के कठिनाइयों और संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ता जा रहा है। उसके आँसू, पसीना और खून से लथपथ होने के बावजूद वह हार नहीं मान रहा है और अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

प्रश्न 5: ”अग्निपथ’ कविता की मुख्य विशेषता क्या है?’ [2022]
उत्तर:
 ‘अग्निपथ’ कविता में कवि ने शब्दों का कम-से-कम इस्तेमाल किया है और कुछ शब्दों की पुनरावृत्ति की है, जिससे एक प्रभाव उत्पन्न होता है।

प्रश्न 6: ‘अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ से क्या आशय है? अग्निपथ कविता के आधार पर लिखिए।’ [2022]
उत्तर:
 ‘अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ’ का आशय है- संघर्षमय जीवन के दौरान मनुष्य के आँसू, पसीना और रक्त से लथपथ होने का। इसका मतलब है कि मनुष्य कठिनाइयों का सामना करके अपने मंजिल की दिशा में अग्रसर बढ़ता है।

Short Answer Type Questions

प्रश्न 1. संघर्ष करते रहने वाला व्यक्ति क्या कभी थक सकता है ? यदि हाँ तो किन स्थितियों में। [2025]
उत्तरः सच्चा संघर्ष करने वाला व्यक्ति तब तक नहीं थकता जब तक उसे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। उसके लिए थकावट लक्ष्य के मार्ग को त्यागना है न कि लक्ष्य पर चलने के लिए लंबा मार्ग अपनाना। वह केवल उन स्थितियों में थकता है जब उससे लक्ष्य के मार्ग पर चलते-चलते कोई चूक न हो जाये।

प्रश्न 2. ‘एक पत्र छाँह भी माँग मत’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। [2024]
उत्तरः प्रस्तुत कविता में कवि ने संघर्षमय जीवन को ‘अग्निपथ’ कहते हुए मनुष्य को यह सन्देश दिया है कि राह में सुख रूपी छाँह की चाह न कर, अपनी मंजिल की ओर कर्मठतापूर्वक बिना थकान महसूस किए बढ़ते ही जाना चाहिए।

प्रश्न 3. ‘अग्निपथ’ कविता का केन्द्रीय भाव लिखिए। [2023]
उत्तरः इस कविता का मूल भाव है निरन्तर संघर्ष करते हुए जियो। कवि जीवन को अग्निपथ अर्थात् आग से भरा पथ मानता है। इसमें पग-पग पर चुनौतियाँ और कष्ट हैं। मनुष्य को इन चुनौतियों से नहीं घबराना चाहिए और इनसे मुँह भी नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि आँसू पीकर, पसीना बहाकर तथा खून से लथपथ होकर भी निरन्तर संघर्ष पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

प्रश्न 4. अग्निपथ के मुसाफिर को क्या शपथ लेनी चाहिए और क्यों? [2022]
उत्तरः अग्निपथ के मुसाफिर को संघर्ष के रास्ते पर चलते रहने की शपथ लेनी चाहिए। तभी वह अपने लक्ष्य पर पहुँच पाएगा। वह जीवन भर संघर्ष से थकेगा नहीं। चाहे अनगिनत कठिनाइयाँ घेर लें। परन्तु वह जीवन रूपी पथ पर चलकर अपनी मंजिल को प्राप्त करेगा। 

Long Answer Type Questions

प्रश्न 1. ‘अग्निपथ’ कविता में ‘अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ’ मनुष्य के जीवन के जीवन को एक महान दृश्य बताकर हमें क्या सन्देश दिया गया है? स्पष्टकीजिए। [2025]
उत्तरः जीवन-पथ अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से भरा।
लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए परिश्रम आवश्यक है।
राह में विभिन्न घटनाओं का सामना करना पड़ेगा।
जीवन में आँसू, पसीना और रक्त भी बहाना पड़ सकता है। पर हमें आगे ही बढ़ते जाना है।
व्याख्यात्मक हल:
कवि कहता है कि जीवन पथ अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रकार की परिस्थितियों से भरा हुआ है। यह संसार अग्नि से पूर्ण मार्ग के समान कठिन है और इस कठिन मार्ग का सबसे सुन्दर दृश्य कवि के अनुसार कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ना है। संघर्ष-पथ पर चलने पर उसकी (मनुष्य की) आँखों से आँसू बहते हैं, शरीर से पसीना निकलता है और खून बहता है, फिर भी वह इन सब की परवाह किए बिना निरन्तर परिश्रम करते हुए संघर्ष-पथ पर बढ़ता जाता है।

प्रश्न 2. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए- [2023]

(क) चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ।

उत्तरः इन पंक्तियों का भाव यह है कि मनुष्य का आगे की ओर चले जाना ही अपने आप में एक विशेष बात हैं। संघर्ष-पथ पर चलने में व्यक्ति को कई बार आँसू बहाने पड़ते हैं। थकने पर वह पसीने से तर-बतर हो जाता है और शक्ति का व्यय करना भी पड़ता है। वह लथपथ हो जाता है। इस स्थिति से न घबराकर निरंतर आगे बढ़ते जाना ही जीवन का लक्ष्य है।

(ख) यह महान दृश्य है
चल रहा है मनुष्य
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

उत्तरः कवि कहता है कि हे मनुष्य यह संसार अग्नि से पूर्ण मार्ग के समान कठिन है। इस कठिन मार्ग पर सबसे सुन्दर दृश्य यही हो सकता है कि मनुष्य कठिनाइयों का सामना करते हुए निरन्तर चल रहा है। कठिनाइयों का सामना करते हुए उसकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, शरीर से पसीना निकल रहा है और खून बह रहा है। फिर भी वह इनकी परवाह किए बिना निरन्तर संघर्ष-पथ पर बढ़ता जा रहा है। सामने कठिनाइयों से पूर्ण मार्ग है, फिर भी मनुष्य को चलते चले जाना है।

08. गीत – अगीत – Previous year question

Very Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: पाटल कौन है? वह किस अवस्था में है?  [2025]
उत्तर:
 पाटल गुलाब है तथा वह मौन अवस्था में तट पर खड़ा हुआ है।

प्रश्न 2: प्रेयसी गीत को सुनकर क्या विचार करती है?  [2023]
उत्तर:
 प्रेमी द्वारा गाए जा रहे गीत को सुनकर प्रेयसी विचार करती है कि ईश्वर ने उसे इस गीत की एक कड़ी क्यों नहीं बनाया? उसे भी इस गीत का हिस्सा होना चाहिए था।

प्रश्न 3: निर्झरी कौन है?  [2022]
उत्तर:
 निर्झरी नदी या झरना है।

प्रश्न 4: शुकी किस अवस्था में बैठी हुई है?  [2021]
उत्तर:
 शुकी ने अपने पंख फुला रखे हैं और वह घोंसले में रखे अंडों को सेने का काम कर रही है।


Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: ‘गीत-अगीत’ कविता में कवि की दुविधा क्या है? उसने अपनी दुविधा को किन उदाहरणों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है? [2025]
उत्तर: 
‘गीत-अगीत’ कविता में कवि की दुविधा है कि अपनी वेदना को मन-ही-मन अनुभव करना ठीक है या उसे प्रकट करना। वह निम्न उदाहरणों से अपनी दुविधा व्यक्त करता है- नदी और किनारा, निर्झरी और गुलाब, शुक और शुकी, विरही गायक और उसकी राधा।

प्रश्न 2: कवि ने ‘अगीत’ को गीत के समान महत्त्व क्यों दिया है?  [2024]
उत्तर: 
कवि गीत को भावनाओं का प्रकटीकरण मानता है। इसमें भावनाओं का महत्त्व शब्दों से अधिक है। शब्द बाह्य है, भावना अन्दरूनी। बाह्य अलंकरण मात्र होता है। शब्द उमड़ने से पहले जो भावनाएँ हृदय में होती हैं, उन्हीं का महत्त्व होता है। ये भावनाएँ हर मनुष्य में होती हैं। शब्दों के माध्यम से प्रकटीकरण सभी नहीं कर पाते। हृदय में उमड़ने वाली भावनाएँ किसी गीत से कम नहीं होतीं। अतः ‘अगीत’ का महत्त्व गीत के समान ही है।


प्रश्न 3: प्रकृति के साथ पशु-पक्षियों के संबंधों के बारे में स्पष्ट कीजिए। [2023]
उत्तर: 
प्रकृति के साथ पशु-पक्षियों के संबंधों के बारे में निम्नलिखित स्पष्टीकरण हैं-

  • प्रकृति का श्रृंगार पशु-पक्षी हैं और प्रकृति इनका शृंगार है।
  • प्रकृति की सुषमा को देखकर ही पशु-पक्षी मस्त होते हैं।
  • ये प्रकृति को अपने सुरों से संगीतमयी बनाते हैं।
  • प्रकृति के हर रूप के साथ रहकर पशु-पक्षी अपना स्नेह दर्शाते हैं।
  • पशु-पक्षी प्रकृति की सफाई करके पर्यावरण को शुद्ध भी करते हैं।

प्रश्न 4: मनुष्य प्रकृति के किस रूप से आंदोलित होता है?  [2022]
उत्तर:
 मनुष्य प्रकृति के अनेक रूपों से आंदोलित होता है, जो निम्नलिखित हैं-

  • प्रकृति का मोहक व शांत वातावरण उसे शांति प्रदान करता है।
  • प्रात:कालीन सूर्य से उसे उल्लास व स्फूर्ति प्राप्त होती है।
  • घुमड़ते बादलों को देखकर मनुष्य प्रसन्न होता है। उसमें आशा का संचार होता है।
  • मनुष्य को प्रकृति अपने साथ हँसती रोती जान पड़ती है।


Long Answer Type Questions

प्रश्न 1: शुकी, शुक के प्रेम-भरे गीत सुनकर भी बाहर क्यों नहीं आती है ? [2025]
उत्तर: शुकी घोंसले में अपने पंख फैलाकर अपने अंडे सेने का काम कर रही है। वह मातृत्व स्नेह से भरी हुई है। उसे शुक के प्रेम-भरे गीत सुनाई दे रहे हैं। परंतु उसके गीत मन में उमड़कर भी बाहर नहीं आते। शुकी अपने उत्पन्न होने वाले बच्चों के प्रेम में सिक्त है। वह शुक का प्रेम-गीत सुन रही है, परंतु उसका प्रेम मौन रूप धारण किए हुए है। वह अपना प्रेम प्रकट नहीं करती है क्योंकि वह मातृत्व के सुखद भावों में डूबी हुई है। 

प्रश्न 2: ‘गीत-अगीत’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि प्रेम की पहचान मुखरता में नहीं अपितु मौन भाव में है।  [2023]
उत्तर:
 ‘गीत-अगीत’ कविता में कविवर श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने प्रेम के साहित्यिक पक्ष को अभिव्यक्ति प्रदान की है। कवि का मानना है कि प्रेम की पहचान मुखरता में नहीं अपितु प्रेम की पीड़ा को मौन भाव से पी जाने में है। इसे कवि ने नदी और गुलाब, शुक और शुकी तथा प्रेमी और प्रेमिका की निम्नलिखित तीन स्थितियों के माध्यम से स्पष्ट किया है –

  • नदी पहाड़ से नीचे उतरकर समुद्र की ओर तेजी से आगे बढ़ती हुई निरंतर विरह के गीत गाती है। वह किनारे या मध्य धारा में पड़े पत्थरों से दिल की पीड़ा कहकर अपना मन हल्का कर लेती है। लेकिन किनारे पर उगा हुआ एक गुलाब मन ही मन सोचता है कि भगवान यदि उसे भी वाणी प्रदान करता तो वह भी पतझड़ में मिलने वाली हताशा और दुख प्रकट कर पाता। वह भी संसार को बताता कि विरह की पीड़ा कितनी दुखमय है, पर वह ऐसा कर नहीं पाता। नदी तो गा-गाकर विरह भावना को व्यक्त करती हुई बह रही है पर गुलाब किनारे पर चुपचाप खड़ा है।
  • एक तोता किसी पेड़ की उस घनी शाखा पर बैठा है जो नीचे की शाखा को छाया दे रहा है जिस पर उसका घोंसला है घोंसले में तोती पंख फुला कर मौन भाव से बैठी है। वह मातृत्व भाव से भरी हुई है और अपने अंडों को सेने का कार्य कर रही है। सूर्य के निकलने के बाद सुनहरी वसंती किरणें जब पत्तों से छन-छनकर नीचे आती हैं तो तोता प्रसन्नता से भरकर मधुर गीत गाता है, किंतु तोती मौन है। उसके गीत मन में उमड़कर भी बाहर नहीं आते। वह तो अपने उत्पन्न होने वाले बच्चों के प्रेम में मग्न है। तोते का स्वर तो सारे जंगल में गूँज रहा है, वह अपने प्रसन्नता के भावों को प्रकट कर रहा है पर तोती अपने पंख फुला कर मातृत्व के सुखद भावों में डूबी है।
  • शाम के समय प्रेमी आल्हा की कथा को रसमय ढंग से गाता है। उसकी आवाज़ सुनते ही उसकी प्रेमिका स्वयं ही खिंची चली आती है – वह घर में नहीं रह पाती। वह प्रेमी के सामने यह सोचकर नहीं जाती कि कहीं उसका प्रेमी गीत गाना बंद न कर दे। वह वहीं एक नीम के पेड़ के नीचे चोरी-चोरी छिपकर गीत सुनती रहती है और मन में सोचती है कि हे ईश्वर ! मैं भी अपने प्रेमी के गीत की एक कड़ी क्यों न बन गई? प्रेमी उच्च स्वर में गीत गा रहा है पर प्रेमिका का हृदय मूक प्रसन्नता से भरता जा रहा है।
    इन तीनों स्थितियों में नदी, शुक और प्रेम मुखरित हैं किंतु गुलाब, शुकी और प्रेमिका अपने प्रेम को व्यक्त नहीं करते हैं किंतु मन-ही-मन प्रेम का आस्वादन करते हैं। इनका प्रेम भी नदी, शुक और प्रेमी से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इनका यह मौन भाव ही इनके सात्विक प्रेम की पहचान है। इसलिए स्पष्ट है कि सच्चा प्रेम मुखरता में नहीं बल्कि मौन भाव में होता है।

07. दोहे – Previous year question

Very Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: सागर की बड़ाई क्यों नहीं होती? रहीम के पद के आधार पर लिखिए।  [2025]
उत्तर:
 सागर के जल से किसी की प्यास न बुझने के कारण सागर की बड़ाई नहीं होती।

प्रश्न 2: विपत्ति में मनुष्य का सहायक कौन होता है? [2024]
उत्तर:
 विपत्ति में मनुष्य का सहायक अपनी सम्पत्ति होती है। बाहरी सहायता से कोई लाभ नहीं होता है। कमल की रक्षा पानी करता है, न कि सूर्य।

प्रश्न 3: दु:खी व्यक्ति के साथ संसार कैसा व्यवहार करता है? [2023]
उत्तर: 
दुखी व्यक्ति का संसार मज़ाक उड़ाता है। वह उसके कष्टों को कम नहीं करता। अतः मनुष्य को अपनी पीड़ा दूसरे को नहीं कहनी चाहिए।

प्रश्न 4: रहीम ने किस लोकसत्य को बताया है? [2023]
उत्तर: 
कवि ने बताया है कि छोटी चीज अगर लोक हितकारी है तो वह धन्य है। समाज के काम न आने वाली बड़ी चीज का कोई लाभ नहीं है।

प्रश्न 5: कवि ने पानी का क्या महत्त्व बताया है? [2022]
उत्तर: 
कवि बताता है कि पानी के बिना संसार सूना है। पानी के अभाव में व्यक्ति, मोती तथा आटा तीनों निरर्थक हैं। 

Short Answer Type Questions

प्रश्न 1: रहीम ने प्रेम के सम्बन्ध में किसका उदाहरण दिया है? प्रेम और धागे में क्या समानता है?  [2025]
उत्तरः इसके संबंध में रहीम ने धागे का उदाहरण दिया है। प्रेम धागे के समान कोमल और अखण्ड होता है। जिस प्रकार धागा यदि एक बार टूट गया तो फिर जुड़ नहीं पाता और यदि जोड़ भी दिया जाये तो उसमें गाँठ पड़ जाती है वैसा ही प्रेम संबंध है। इसलिए प्रेम रूपी धागा कभी तोड़ना नहीं चाहिए।

प्रश्न 2: एक के साधने से सब कैसे सध जाता है?  [2024]
उत्तरः (i) एक काम को साधने से सब काम वैसे ही सँवर जाते हैं जैसे जड़ में पानी देने से फूल, पत्ती, पूर्ण पेड़ का विकास होता है।
(ii) एक ही परमात्मा के साधने से अन्य सारे काम स्वयं ही सध जाते हैं।
(iii) वही तो सबका मूल है।
(iv) जड़ (मूल) सींचने से फल-फूल स्वयं ही (वृक्ष) लहलहा उठते हैं। उसी प्रकार परमात्मा को साधने से सभी काम सध जाते हैं और पूरे हो जाते हैं।

प्रश्न 3: रहीम ने सागर जल की अपेक्षा पंक जल को धन्य क्यों कहा है?  [2022]
उत्तरः रहीम ने सागर के जल को व्यर्थ इसलिए कहा है, क्योंकि यह पीने के काम नहीं आता। सागर में अथाह जल होने पर भी लोग प्यासे मरते हैं। इसकी तुलना में पंक-जल गंदा होते हुए भी इसलिए धन्य है, क्योंकि इसे पीकर छोटे-छोटे जीवों की प्यास बुझती है। इस प्रकार यह जल उपयोगी है जबकि सागर के जल का कोई उपयोग नहीं है।

प्रश्न 4: ‘मोती, मानुष, चून’ के सन्दर्भ में पानी के महत्व को स्पष्ट कीजिए।  [2021]
उत्तरः ‘मोती’ के सन्दर्भ में पानी का अर्थ चमक (कान्ति) है। इसी चमक से वह कीमती बनता है। ‘मानुष’ के सन्दर्भ में ‘पानी’ इज्जत, मान-सम्मान का प्रतीक बनकर आता है। इसी से मनुष्य का समाज में स्थान निश्चित होता है। ‘चून’ के सन्दर्भ में पानी ही उसे गूँदने के काम आता है और तभी इससे खाना पकना संभव होता है। 

Long Answer Type Questions

प्रश्न 1: रहीम के अनुसार कौन-सा जल स्त्रोत या साधन उपयोगी होता है?  [2025]
उत्तरः
 रहीम के अनुसार, वही जल स्त्रोत या साधन मनुष्य के लिए उपयोगी होता है जो उसके काम आता है। सागर कितना भी बड़ा हो किन्तु वह किसी की प्यास नहीं बुझा पाता, इसलिए अनुपयोगी होता है। इसके विपरीत पंक का जल भी लघु जीवों के काम आने के कारण उपयोगी कहलाता है। इसलिए महत्व उपयोग में आने का है, विस्तार का नहीं।
व्याख्यात्मक हल: रहीम के अनुसार किसी भी व्यक्ति या वस्तु की महत्ता उसके छोटे या बड़े होने के आधार पर तय नहीं होती बल्कि उसकी उपयोगिता के आधार पर होती है। जो हमारे लिए जितना अधिक उपयोगी होगा वह उतना ही महत्वपूर्ण माना जाएगा। जिस प्रकार सागर बहुत विशाल होता है लेकिन उसका पानी खारा होने के कारण किसी की प्यास नहीं बुझा सकता इसलिए वह हमारे लिए अनुपयोगी होता है। इसके विपरीत कीचड़ से युक्त जल पीकर छोटे-छोटे जीव अपनी प्यास बुझा सकते हैं। इसलिए सागर की अपेक्षा कीचड़ से युक्त जल श्रेष्ठ है।

प्रश्न 2: हमें अपने निर्धन मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। इस भाव के लिए रहीम ने कौन-सा उदाहरण दिया है?  [2023]
अथवा
सूई तथा तलवार के उदाहरण द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहते हैं? 
अथवा
लघु वस्तु का तिरस्कार क्यों नहीं करना चाहिए? 
उत्तरः रहीम का मानना है कि प्रत्येक छोटी-बड़ी वस्तु की अपनी अलग-अलग उपयोगिता होती है, इसलिए वह कहते हैं कि कभी भी धनी मित्रों को पाकर निर्धन मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। इसके लिए रहीम सुई और तलवार का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जहाँ सुई का काम होता है, वहाँ तलवार व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार रहीम इस उदाहरण के माध्यम से समाज में सभी के सम्मान का संदेश देते हैं। सभी वस्तु भले ही वे छोटी ही क्यों न हों, उपयोगी होती हैं इसलिए छोटे व्यक्तियों या छोटी वस्तुओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 3: विपत्ति में हमारा सहायक कौन बनता है? रहीम के दोहों के आधार पर उत्तर दीजिए?  [2022]
अथवा
रहीम ने जलहीन कमल का उदाहरण देकर क्या सिद्ध करना चाहता है? इससे हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तरः रहीम के अनुसार विपत्तियों में अपने ही साधन और संबंध काम आते हैं। उदाहरण के लिए सूखते हुए कमल को जल ही बचा सकता है। सूरज की ऊष्मा से नहीं कमल जल में से जन्म लेता है इसलिए वही उसका जीवन रक्षक होता है। यदि वही सूख गया तो फिर सब कुछ नष्ट हो जाता है। 
व्याख्यात्मक हल: रहीम दास जी कहते हैं कि जिसके पास अपना कुछ नहीं, दूसरे भी उसकी सहायता नहीं कर सकते। संसार में अपनी सम्पत्ति अपनी योग्यता के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः मुसीबत के समय अपने आत्मबल को बनाए रखना चाहिए। जिस तरह सूखते हुए कमल को जल ही बचा सकता है। जल ही जलज का जीवन है। सूरज की ऊष्मा नहीं। कमल जल में से जन्म लेता है। जल के न होने पर सूरज भी कमल को जीवन दान नहीं कर सकता।