7. नेताजी का चश्मा – पाठ का सार

पाठ का संक्षिप्त परिचय

‘नेताजी का चश्मा’ कहानी केप्टन चश्मेवाले के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों के योगदान को रेखांकित करती है, जो इस देश के निर्माण में अपने-अपने तरीके से योगदान देते हैं। कहानी के अनुसार बड़े ही नहीं, बच्चे भी इसमें शामिल हैं। देश बनता है उसमें रहने वाले सभी नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों से और इन सबसे प्रेम करने तथा इनकी सुख-समृद्धि के लिए प्रयास करने की भावना का नाम देशभक्ति है।

पाठ का सार

  • हालदार साहब को हर पन्द्रहवें दिन कम्पनी के काम से एक छोटे कस्बे से गुजरना पड़ता था। उस कस्बे में एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का कारखाना, दो ओपन सिनेमा घर तथा एक नगरपालिका थी।
  • नगरपालिका थी तो कुछ ना कुछ करती रहती थी, कभी सड़के पक्की करवाने का काम तो कभी शौचालय तो कभी कवि सम्मेलन करवा दिया।
  • एक बार नगरपालिका के एक उत्साही अधिकारी ने मुख्य बाज़ार के चैराहे पर सुभाषचन्द्र बोस की संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। चूँकि बजट ज्यादा नही था इसलिए मूर्ति बनाने का काम कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के शिक्षक को सौंपा गया।
  • मूर्ति सुन्दर बनी थी बस एक चीज़ की कमी थी, नेताजी की आँख पर चश्मा नहीं था। एक सचमुच के चश्मे का चौड़ा काला फ्रेम मूर्ति को पहना दिया गया। जब हालदार साहब आये तो उन्होंने सोचा वाह भई! यह आईडिया ठीक है। मूर्ति पत्थर की पर चश्मा रियल।
  • दूसरी बार जब हालदार साहब आये तो उन्हें मूर्ति पर तार का फ्रेम वाले गोल चश्मा लगा था। तीसरी बार फिर उन्होंने नया चश्मा पाया। इस बार वे पान वाले से पूछ बैठे कि नेताजी का चश्मा हरदम बदल कैसे जाता है।
  • पानवाले ने बताया की यह काम कैप्टन चश्मेवाला करता है। हालदार साहब को समझते देर न लगी की बिना चश्मे वाली मूर्ति कैप्टन को ख़राब लगती होगी इसलिए अपने उपलब्ध फ्रेम में से एक को वह नेताजी के मूर्ति पर फिट कर देता होगा।
  • जब कोई ग्राहक वैसे ही फ्रेम की मांग करता जैसा मूर्ति पर लगा है तो वह उसे मूर्ति से उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर नया फ्रेम लगा देता चूँकि मूर्ति बनाने वाला मास्टर चश्मा भूल गया।
  • हालदार साहब ने पान वाले जानना चाहा कि कैप्टन चश्मेवाला नेताजी का साथी है या आजाद हिन्द फ़ौज का कोई भूतपूर्व सिपाही? पान वाले बोला कि वह लंगड़ा क्या फ़ौज में जाएगा, वह पागल है इसलिए ऐसा करता है।
  • हालदार साहब को एक देशभक्त का मजाक बनते देखना अच्छा नही लगा। कैप्टन को देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ चूँकि वह एक बूढ़ा मरियल- लंगड़ा सा आदमी था जिसके सिर पर गांधी टोपी तथा चश्मा था, उसके एक हाथ में एक छोटी-सी संदूकची और दूसरे में एक बांस में टंगे ढेटों चश्मे थे।
  • वह उसका वास्तविक नाम जानना चाहते थे परन्तु पानवाले ने इससे ज्यादा बताने से मना कर दिया दो साल के भीतर हालदार साहब ने नेताजी की मूर्ति पर कई चश्मे लगते हुए देखे।
  • एक बार जब हालदार साहब कस्बे से गुजरे तो मूर्ति पर कोई चश्मा नही था।
  • पूछने पर पता चला की कैप्टन मर गया, उन्हें बहुत दुःख हुआ।
  • पंद्रह दिन बाद कस्बे से गुजरे तो सोचा की वहाँ नही रुकेंगे, पान भी नही खायेंगे, मूर्ति की ओर देखेंगे भी नहीं। परन्तु आदत से मजबूर हालदार साहब की नजर चौराहे पर आते ही आँखे मूर्ति की ओर उठ गयीं।
  • वे जीप से उतरे और मूर्ति के सामने जाकर खड़े हो गए। मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना हुआ छोटा सा चश्मा रखा था, जैसा बच्चे बना लेते हैं। यह देखकर हालदार साहब की आँखे नम हो गयीं।

लेखक परिचय

स्वंय प्रकाश: इनका जन्म सन 1947 में इंदौर (मध्य प्रदेश) में हुआ। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढाई कर एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी करने वाले स्वंय प्रकाश का बचपन और नौकरी का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बिता। फिलहाल वे स्वैछिक सेवानिवृत के बाद भोपाल में रहते हैं और वसुधा सम्पादन से जुड़े हैं।

प्रमुख कार्य

कहानी संग्रह – सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी, संधान।
उपन्यास – बीच में विनय और ईंधन।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. कस्बा – छोटा शहर
  2. लागत – खर्च
  3. उहापोह – क्या करें, क्या ना करें की स्थिति
  4. शासनाविधि – शासन की अविधि
  5. कमसिन – कम उम्र का
  6. सराहनीय – प्रशंसा के योग्य
  7. लक्षित करना – देखना
  8. कौतुक – आश्चर्य
  9. दुर्दमनीय – जिसको दबाना मुश्किल हो
  10. गिराक – ग्राहक
  11. किदर – किधर
  12. उदर – उधर
  13. आहत – घायल
  14. दरकार – आवश्यकता
  15. द्रवित – अभिभूत होना
  16. अवाक् – चुप
  17. प्रफुल्लता – ख़ुशी
  18. हृदयस्थली – विशेष महत्व रखने वाला स्थान

6. संगतकार – पाठ का सार

कविता का सार

इस कविता में कवि ने गायन में मुख्य गायक का साथ देने वाले संगतकार की महत्ता का स्पष्ट किया है। कवि कहते हैं कि मुख्य गायक के गंभीर आवाज़ का साथ संगतकार अपनी कमजोर किन्तु मधुर आवाज़ से देता है। अधिकांशत ये मुख्य गायक का छोटा भाई, चेला या कोई रिश्तेदार होता है जो की शुरू से ही उसके साथ आवाज़ मिलाता आ रहा है। जब मुख्य गायक गायन करते हुए सुरों की मोहक दुनिया में खो जाता है, उसी में रम जाता है तब संगतकार ही स्थायी इस प्रकार गाकर समां बांधे रखता है जैसे वह कोई छूटा हुआ सामान सँजोकर रख रहा हो। वह अपनी टेक से गायक को यह उन दिनों की याद दिलाता है जब उसने सीखना शुरू किया था।

कवि कहते हैं बहुत ऊँची आवाज़ में जब मुख्य गायक का स्वर उखड़ने लगता है और गला बैठने लगता है तब संगतकार अपनी कोमल आवाज़ का सहारा देकर उसे इस अवस्था से उबारने का प्रयास करता है। वह मुख्य गायक को स्थायी गाकर हिम्मत देता है की वह इस गायन जैसे अनुष्ठान में अकेला नहीं है। वह पुनः उन पंक्तियों को गाकर मुख्य गायक के बुझते हुए स्वर को सहयोग प्रदान करता है। इस समय उसके आवाज़ में एक झिझक से भी होती है की कहीं उसका स्वर मुख्य गायक के स्वर से ऊपर ना पहुँच जाए। ऐसा करने का मतलब यह नही है की उसके आवाज़ में कमजोरी है बल्कि वह आवाज़ नीची रखकर मुख्या गायक को सम्मान देता है। इसे कवि ने महानता बताया है।

कवि परिचय

मंगलेश डबराल
इनका जन्म सन 1948 में टिहरी गढ़वाल, उत्तरांचल के काफलपानी गाँव में हुआ और शिक्षा देहरादून में। दिल्ली आकर हिंदी पेट्रियट, प्रतिपक्ष और आसपास में काम करने के बाद ये पूर्वग्रह सहायक संपादक के रूप में जुड़े। इलाहबाद और लखनऊ से प्रकाशित अमृत प्रभात में भी कुछ दिन नौकरी की, बाद में सन 1983 में जनसत्ता अखबार में साहित्य संपादक का पद संभाला। कुछ समय सहारा समय में संपादक रहने के बाद आजकल नेशनल बुक ट्रस्ट से जुड़े हैं।

प्रमुख कार्य
कविता संग्रह – पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं और आवाज़ भी एक जगह है।
पुरस्कार – साहित्य अकादमी पुरस्कार, पहल सम्मान।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. संगतकार – मुख्य गायक के साथ गायन करने वाला या वाद्य बजाने वाला कलाकार।
  2. गरज – उँची गंभीर आवाज़
  3. अंतरा – स्थायी या टेक को को छोड़कर गीत का चरण
  4. जटिल – कठिन
  5. तान – संगीत में स्वर का विस्तार
  6. सरगम – संगीत के सात स्वर
  7. अनहद – योग अथवा  साधन की आनन्दायक स्थिति
  8. स्थायी – गीत का वह चरण जो बार-बार गाय जाता है, टेक
  9. नौसिखिया – जिसने अभी सीखना आरम्भ किया हो।
  10. तारसप्तक – काफी उँची आवाज़
  11. राख जैसा गिरता हुआ – बुझता हुआ स्वर
  12. ढाँढस बँधाना – तसल्ली देना

5. यह दंतुरहित मुस्कान और फसल – पाठ का सार

कविताओं की व्याख्या

यह दंतुरित मुस्कान 

1. यह दंतुरित मुसकान
(i) तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात…
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेपफालिका के पूफल
बाँस था कि बबूल?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
देखते ही रहोगे अनिमेष!
थक गए हो?
आँख लूँ मैं फेर?


शब्दार्थ: दंतुरित = बच्चों के छोटे-छोटे नए-नए दाँतों से युक्त, धूलि-धूसर = धूल-मिट्टी से सना, गात = शरीर, तन, जलजात = कमल का फूल, परस = स्पर्श, पाषाण = पत्थर, शेपफालिका = एक विशेष फूल, अनिमेष = अपलक, बिना पलक झपकाए लगातार देखना।
व्याख्या: अपने शिशु पुत्र को संबोधित करते हुए कवि कहते हैं कि छोटे-छोटे दाँतों से सुशोभित तुम्हारा यह मुखड़ा और तुम्हारी निश्छल मुसकान इतनी मनमोहक और सुंदर है कि वह निर्जीव व्यक्ति में भी प्राण फूँक देगी। कवि कहना चाहते हैं कि इस दंतुरित मुसकान को देखकर मानो मृतक भी जी उठेगा। कवि इतने भावुक हो उठते हैं कि धूल-मिट्टी से सने उसके कोमल शरीर को देखकर उन्हें कमल की प्रतीति हो रही है। वे अचानक कह उठते हैं कि तालाब को छोड़कर कमल मानो मेरी झोंपड़ी में पुत्र के रूप में खिल रहा है और तुम्हारे कोमल स्पर्श को पाकर पत्थर भी पिघलकर मानो जल बन गया है। कवि कहना चाहते हैं कि तुम्हारे सुदंर मुख को देख कर और कोमल स्पर्श को पाकर भला किस पत्थर-हृदय मनुष्य का दिल न पिघलेगा! कवि का मन बाँस और बबूल की भाँति नीरस, शुष्क, ठूँठ जैसा हो गया था। वे घर छोड़कर संन्यासी बन गए थे और इधर-उधर घूम रहे थे, किंतु घर पर सुखद आश्चर्य के रूप में उनका शिशु पुत्र अपनी मोहक दंतुरित मुसकान के साथ उन्हें लगातार देखे जा रहा था। उसका कोमल स्पर्श पाकर कवि का ठूँठ जैसा पाषाण हृदय भी शेफालिका के फूलों की भाँति झरने लगा। उनके हृदय में वात्सल्य रस की धार बह निकली। अनायास ही वे अपने पुत्र से कहते हैं कि तुमने आज से पूर्व मुझे कभी देखा ही नहीं, इसलिए शायद तुम मुझे पहचान नहीं पा रहे हो। लेकिन इस प्रकार एकटक देखते रहने से तुम थक गए होगे। कवि भी लगातार उसे देख रहे थे, किंतु अपने शिशुपुत्र को थकान से उबारने के लिए वे अपनी आँखें फेर लेने का प्रस्ताव रखते हैं। वे कहते हैं कि अगर मैं अपनी दृष्टि घुमा लूँगा तो तुम भी आसानी से अपनी नशर घुमा लोगे और एकटक देखते रहने के श्रम से बच जाओगे।
विशेष
1. प्रस्तुत काव्यांश के प्रत्येक शब्द में कवि का ममत्व झलक रहा है।
2. भाषा सरल खड़ी बोली है, किंतु पाषाण, जलजात, शेफालिका जैसे तत्सम शब्दों का भी कवि ने सुंदर प्रयोग किया है। ‘धूल-धूसरित’ में अनुप्रास अलंकार है।
3. शिशु के धूल-धूसरित गात में ‘जलजात’ का आरोप किया गया है। अतः यहाँ रूपक अलंकार है।
4. ‘तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान, मृतक में भी डाल देगी जान’ में अतिशयोक्ति अलंकार है।
5. ‘परस पाकर तुम्हारा ही प्राण, पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण’ इसमें उत्प्रेक्षा अलंकार है।
6. बाँस या बबूल के समान नीरस शुष्क ठूँठ रूपी कवि- हृदय में शेफालिका के झरने की कल्पना कवि के अंतर की सुखानुभूति को स्पष्ट करती है।
7. आँख पेफर लेना – मुहावरेदार भाषा का सुंदर प्रयोग।

2. क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्वफ
उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्वफ
देखते तुम इधर कनखी मार
और होतीं जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगती बड़ी ही छविमान!


शब्दार्थ: परिचित = जिससे जान-पहचान हो, माध्यम = मध्य का, साधन, जिसके द्वारा कोई कार्य या उद्देश्य संपन्न हो। चिर प्रवासी = बहुत दिनों तक कहीं और रहने वाला, इतर = अन्य, दूसरा, संपर्वफ = संबंध, मधुपर्वफ = दही, घी, शहद, जल और दूध के मिश्रण से बना भगवान को भोग के रूप में चढ़ाया जाने वाला प्रसाद, जिसे अतिथियों में भी बाँटा जाता है। लोग इसे पंचामृत भी कहते हैं, कविता में इसका प्रयोग बच्चे को जीवन देने वाला आत्मीयता की मिठास से युक्त माँ के प्यार के रूप में हुआ है, कनखी = तिरछी निगाह से देखना, छविमान= सुंदर, आँखें चार होना = परस्पर देखना।
व्याख्या: शिशु अपनी दंतुरित मुसकान के साथ एकटक अपने पिता की ओर देख रहा है, किंतु अबोध बालक अपने पिता को नहीं पहचानता। आज प्रथम बार वह उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो रहा है। कवि को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उसकी आँखों में जिज्ञासा है, पहचानने की चेष्टा व व्याकुलता है। कवि उसे संबोधित करते हुए कहते हैं कि अरे बेटे! यदि पहली बार देखकर मुझे पहचान न सके तो कोई बात नहीं। मैं ही कभी तुम्हारे सामने न आया तो भला तुम मुझे केसे पहचानोगे? अगर तुम्हारी माँ न होतीं तो आज तुम्हें मैं देख भी नहीं पाता। मैं घर पर नहीं रहा। आज अतिथि जैसे मुझे देखकर शायद तुम मेरा परिचय पाना चाहते हो। तुमसे मेरा क्या संबंध है, यह तुम नहीं जानते किंतु तुम धन्य हो और तुम्हारी माँ भी धन्य हैं, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और अब तक तुम्हारी देखभाल की। मैं ही गैर जैसा घर से बाहर इधर-उधर भटकता रहा। तुम्हारे साथ तुम्हारी माँ का स्नेह-संपर्वफ सदा बना रहा क्योंकि उन्होंने अपने हाथों से तुम्हें सदा खिलाया-पिलाया, कवि इसमें अपनी पत्नी का आभार मानते हैं।
कवि अपने पुत्र से कहते हैं कि मेरी तरपफ देखते हुए जब-जब हम दोनों की निगाहें मिल जाती हैं तब-तब तुम मुसकरा देते हो और तुम्हारे छोटे-छोटे नए दाँत मुझे बरबस आकर्षित कर लेते हैं। तुम्हारी वह मुसकान मुझे इतनी सुंदर लगती है कि मैं उस दिव्य शोभा का वर्णन नहीं कर सकता।
कवि भावावेग में अपना हृदय खोलकर रख देते हैं। शिशु के प्रति पिता के कर्तव्य और दायित्व का यथोचित पालन न कर पाने का दुख उन्हें विह्वल कर देता है। अतः अपने आपको केवल अतिथि जैसा उल्लेख करते हैं। और इतर, अन्य कहकर अपने मन का क्षोभ व्यक्त करते हैं।
विशेष
1. सहज-सरल खड़ीबोली में कवि ने अपने मनोभावों का सजीव चित्राण किया है।
2. ‘उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क’ पंक्ति ने माँ के वात्सल्य, कर्तव्यबोध और गरिमा की अभिव्यक्ति की।
3. ‘कनखी मार देखना’ और ‘आँखें चार होना’ आदि मुहावरों का सटीक प्रयोग हुआ है।
4. ‘मैं इतर, मैं अन्य’ कहकर कवि ने अपने मन की हीन भावना और क्षोभ को व्यक्त किया है। शायद इस समय उन्हें चिर-प्रवासी होने का दुख साल रहा है।
5. पत्नी और पुत्र के प्रति उनके मन में अपार कृतज्ञता का भाव है।
6.  शिशु की दंतुरित मुसकान का सहज, स्वाभाविक वर्णन कविता को अतुलनीय बना देता है।

फसल

1. एक के नहीं,
दो के नहीं,
ढेर सारी नदियों के पानी का जादू:
एक के नहीं,
दो के नहीं,
लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा:
एक की नहीं,
दो की नहीं,
हशार-हशार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म :


शब्दार्थ: कोटि-कोटि = करोड़ों, स्पर्श = छूना, संपर्क, गरिमा = गौरव।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि फसल उगाने के लिए बीज, मिट्टी, पानी, हवा, सूरज की किरणों आदि की आवश्यकता होती है। ये सब तो प्राकृतिक तत्व हैं। इनके अतिरिक्त किसानों का अथक परिश्रम भी आवश्यक है। इसलिए कवि कहते हैं एक या दो व्यक्ति के हाथों के नहीं अपितु लाखों-करोड़ों यानी असंख्य लोगों के हाथों के स्पर्श से फसल उगती है, बढ़ती है और लहलहाती है। कवि कहते हैं कि किसान लाख यत्न से बीज मिट्टी में बो दें, किंतु यदि उसमें पानी का छिड़काव न हो तो बीज पनप ही नहीं सकता। इसलिए बीज कु उगने में आरै फसल तैयार होने में पानी एक अत्यावश्यक तत्व है। कवि ने यहाँ कहा है कि किसी एक या दो नदियों का पानी नहीं बल्कि ढेर सारी नदियों के पानी का जादू इसमें होता है। इसका तात्पर्य यह है कि अनगिनत नदियों का पानी भाप बनकर उड़ जाता है जो फिर बादल बनकर धरती पर बरसता है। भीषण गर्मी से तपती धरती को, झुलसते पेड़-पौधों को, समग्र प्राणिजगत को यही पानी नया जीवन दान देता है। इसलिए पानी जब बरसता है तो फसल लहलहाने लगती है। अब कवि मिट्टी के गुण-धर्म की बात करते हैं। अलग-अलग मिट्टी की अलग-अलग विशेषता होती है। सभी मिट्टियाँ एक समान नहीं होतीं। उनके रूप, गुण, वैशिष्ट्य सब अलग-अलग होते हैं और इस प्रकार अलग-अलग गुण-धर्म वाली मिट्टी में अलग-अलग प्रकार की पैदावार होती है। संक्षेप में, लाल, काली, भूरी, पीली, चिकनी या रेतीली मिट्टी में अलग-अलग प्रकार की फसल उगती है।
विशेष
1. प्रस्तुत काव्यांश की भाषा सरल खड़ी बोली है और इसमें स्पर्श, गरिमा और कोटि-कोटि जैसे तत्सम शब्दों का पुट है।
2. लाख-लाख, कोटि-कोटि, हशार-हशार में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
3. ‘एक के नहीं, दो के नहीं’- इन पदों की बार-बार आवृत्ति से कविता में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो गया है।
प्राकृतिक तत्वों और मनुष्य के परिश्रम के सहयोग से ही फसल रूपी सृजन संभव है कवि यह बताना चाहते हैं।

2. फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!


शब्दार्थ: महिमा = महत्ता, रूपांतर = परिवर्तित रूप, बदला हुआ रूप, सिमटा हुआ संकोच = सिमटकर मंद हो गया, थिरकन = नाच, गति।
व्याख्या: खेतों में लहलहाती फसल को देखकर कवि पूछते हैं कि आखिर यह फसल है क्या? अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं देते हुए वे कहते हैं कि फसल बहुत सारी चीज़ों का सम्मिलित रूप है, जैसे कि नदियों के पानी का जादू, किसानों के मेहनती हाथों की महिमा, विभिन्न प्रकार की मिट्टी का गुण-धर्म, सूर्य की किरणों और वायु की मंद गति का प्रभाव, कहने का तात्पर्य यह है उपर्युक्त इन सब चीजों का समुचित योगदान न होने से फसल कभी पककर तैयार नहीं हो सकती। विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए विभिन्न रूप और गुण वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है। जैसे-धन की फसल के लिए चिकनी मिट्टी, गेहूँ के लिए दोमट उपजाउ मिट्टी, कपास के लिए काली मिट्टी और चाय के लिए पहाड़ी ढलान की आवश्यकता होती है। लाख यत्न से उपयुक्त मिट्टी में बीेज बोने पर भी यदि उसकी समुचित सिंचाई न हो तो बीज पनप हीं सकते। अतः मिट्टी के साथ-साथ नदियों के पानी और किसानों की अथक मेहनत की भी आवश्यकता है। ‘नदियों के पानी का जादू’ का तात्पर्य यह है कि किसी एक या दो नदियों का पानी नहीं, बल्कि छोटी-बड़ी ढेर सारी नदियों का पानी भाप बनकर उड़ जाता है जो आगे बादल बनकर प्यासी ध्रती पर बरसता है और समस्त प्राणिजगत तथा वनस्पतिजगत को नया जीवनदान देता है। इसीलिए कवि फसल के साथ पानी के जादू की बात कहते हैं। आगे कवि कहते हैं कि सूरज की धूप और प्रकाश में पौधे अपना भोजन तैयार करते हैं और व्रफमशः फलते-फूलते हैं। पर्याप्त धूप से फसल पककर तैयार होती है। साथ ही मंद-मंद बहती हवा फसल को तैयार होने में सहायता पहुँचाती है, वरना तेश हवा के झोंकों से फसल को नुकसान पहुँच सकता है। इस प्रकार इन सबके सम्मिलित योगदान से फसल तैयार होती है।
विशेष
1. प्रस्तुत काव्यांश की भाषा सरल खड़ी बोली है, जिसमें स्पर्श, महिमा, रूपांतर, संकोच आदि तत्सम शब्दों का समुचित प्रयोग हुआ है।
2. प्राकृतिक उपादानों के साथ-साथ फसल तैयार होने में मानव-श्रम की भी आवश्यकता है-इस बात को कवि कहना चाहते हैं।

4. उत्साह और अट नहीं रही – पाठ का सार

भावार्थ :

उत्साह

प्रस्तुत कविता एक आह्वाहन गीत है। इसमें कवि बादल से घनघोर गर्जन के साथ बरसने की अपील कर रहे हैं। बादल बच्चों के काले घुंघराले बालों जैसे हैं। कवि बादल से बरसकर सबकी प्यास बुझाने और गरज कर सुखी बनाने का आग्रह कर रहे हैं। कवि बादल में नवजीवन प्रदान करने वाला बारिश तथा सबकुछ तहस-नहस कर देने वाला वज्रपात दोनों देखते हैं इसलिए वे बादल से अनुरोध करते हैं कि वह अपने कठोर वज्रशक्ति को अपने भीतर छुपाकर सब में नई स्फूर्ति और नया जीवन डालने के लिए मूसलाधार बारिश करे।
आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादल को देखकर कवि को लगता है की वे बेचैन से हैं तभी उन्हें याद आता है कि समस्त धरती भीषण गर्मी से परेशान है इसलिए आकाश की अनजान दिशा से आकर काले-काले बादल पूरी तपती हुई धरती को शीतलता प्रदान करने के लिए बेचैन हो रहे हैं। कवि आग्रह करते हैं की बादल खूब गरजे और बरसे और सारे धरती को तृप्त करे।

अट नहीं रही

प्रस्तुत कविता में कवि ने फागुन का मानवीकरण चित्र प्रस्तुत किया है। फागुन यानी फ़रवरी-मार्च के महीने में वसंत ऋतू का आगमन होता है। इस ऋतू में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और नए पत्ते आते हैं। रंग-बिरंगे फूलों की बहार छा जाती है और उनकी सुगंध से सारा वातावरण महक उठता है। कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो फागुन के सांस लेने पर सब जगह सुगंध फैल गयी हो। वे चाहकर भी अपनी आँखे इस प्राकृतिक सुंदरता से हटा नही सकते।
इस मौसम में बाग़-बगीचों, वन-उपवनों के सभी पेड़-पौधे नए-नए पत्तों से लद गए हैं, कहीं यहीं लाल रंग के हैं तो कहीं हरे और डालियाँ अनगिनत फूलों से लद गए हैं जिससे कवि को ऐसा लग रहा है जैसे प्रकृति देवी ने अपने गले रंग बिरंगे और सुगन्धित फूलों की माला पहन रखी हो। इस सर्वव्यापी सुंदरता का कवि को कहीं ओऱ-छोर नजर नही आ रहा है इसलिए कवि कहते हैं की फागुन की सुंदरता अट नही रही है।

कवि परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

इनका जन्म बंगाल के महिषादल में सन 1899 में हुआ था। ये मूलतः गढ़ाकोला, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। इनकी औपचारिक शिक्षा नवीं तक महिषादल में ही हुई। इन्होने स्वंय अध्ययन कर संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की विचारधारा ने इनपर गहरा प्रभाव डाला। सन 1961 में इनकी मृत्यु हुई।

प्रमुख कार्य

काव्य-रचनाएं – अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. धराधर – बादल
  2. उन्मन – अनमनापन
  3. निदाघ – गर्मी
  4. सकल – सब
  5. आभा – चमक
  6. वज्र – कठोर
  7. अनंत – जिसका अंत ना हो
  8. शीतल – ठंडा
  9. छबि – सौंदर्य
  10. उर – हृदय
  11. विकल – बैचैन
  12. अट – समाना
  13. पाट-पाट – जगह-जगह
  14. शोभा श्री – सौंदर्य से भरपूर
  15. पट – समा नही रही

3. आत्मकथ्य – पाठ का सार

भावार्थ :

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्‍य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्‍यंग्‍य मलिन उपहास
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

अर्थ – इस कविता में कवि ने अपने अपनी आत्मकथा न लिखने के कारणों को बताया है। कवि कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का मन रूपी भौंरा प्रेम गीत गाता हुआ अपनी कहानी सुना रहा है। झरते पत्तियों की ओर इशारा करते हुए कवि कहते हैं कि आज असंख्य पत्तियाँ मुरझाकर गिर रही हैं यानी उनकी जीवन लीला समाप्त हो रही है। इस प्रकार अंतहीन नील आकाश के नीचे हर पल अनगिनित जीवन का इतिहास बन और बिगड़ रहा है। इस माध्यम से कवि कह रहे हैं की इस संसार में हर कुछ चंचल है, कुछ भी स्थिर नही है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के मज़ाक बनाने में लगे हैं, हर किसी को दूसरे में कमी नजर आती है। अपनी कमी कोई नही कहता, यह जानते हुए भी तुम मेरी आत्मकथा जानना चाहते हो। कवि कहता है कि यदि वह उन पर बीती हुई कहानी वह सुनाते हैं तो लोगों को उससे आनंद तो मिलेगा, परन्तु साथ ही वे यह भी देखेंगे की कवि का जीवन सुख और प्रसन्नता से बिलकुल ही खाली है।

भावार्थ :

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
उज्‍ज्‍वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिलाकर हँसतने वाली उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्‍वप्‍न देकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्‍या कर जो भाग गया।

अर्थ – कवि कहते हैं कि उनका जीवन स्वप्न के समान एक छलावा रहा है। जीवन में जो कुछ वो पाना चाहते हैं वह सब उनके पास आकर भी दूर हो गया। यह उनके जीवन की विडंबना है। वे अपनी इन कमज़ोरियों का बखान कर जगहँसाई नही करा सकते। वे अपने छले जाने की कहानी नहीं सुनाना चाहता। जिस प्रकार सपने में व्यक्ति को अपने मन की इच्छित वस्तु मिल जाने से वह प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार कवि के जीवन में भी पएक बार प्रेम आया था परन्तु वह स्वपन की भांति टूट गया। उनकी सारी आकांक्षाएँ महज मिथ्या बनकर रह गयी चूँकि वह सुख का स्पर्श पाते-पाते वंचित रह गए। इसलिए कवि कहते हैं कि यदि तुम मेरे अनुभवों के सार से अपने जीवन का घड़ा भरने जा रहे हो तो मैं अपनी उज्जवल जीवन गाथा कैसे सुना सकता हूँ।

भावार्थ :

जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्‍दर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्‍मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़े कथाएँ आज कहूँ?
क्‍या यह अच्‍छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्‍या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्‍मकथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्‍यथा।

अर्थ – इन पंक्तियों में कवि अपने सुन्दर सपनों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उनके जीवन में कुछ सुखद पल आये जिनके सहारे वे वर्तमान जीवन बिता रहे हैं। उन्होंने प्रेम के अनगनित सपने संजोये थे परन्तु वे सपने मात्र रह गए, वास्तविक जीवन में उन्हें कुछ ना मिल सका। कवि अपने प्रेयसी के सुन्दर लाल गालों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मानो भोर अपनी लाली उनकी प्रेयसी के गालों की लाली से प्राप्त करती है परन्तु अब ऐसे रूपसी की छवि अब उनका सहारा बनकर रह गयी है क्योंकि वास्तविक जीवन वे क्षण कवि को मिलने से पहले ही छिटक कर दूर चले गए। इसलिए कवि कहते हैं कि मेरे जीवन की कथा को जानकर तुम क्या करोगे, अपने जीवन को वे छोटा समझ कर अपनी कहानी नही सुनाना चाहते। इसमें कवि की सादगी और विनय का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। वे दूसरों के जीवन की कथाओं को सुनने और जानने में ही अपनी भलाई समझते हैं। वे कहते हैं कि अभी उनके जीवन की कहानी सुनाने का वक़्त नही आया है। मेरे अतीतों को मत कुरेदो, उन्हें मौन रहने दो।

कवि परिचय

जयशंकर प्रसाद

इनका जन्म सन 1889 में वाराणसी में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में वे पढ़ने गए परन्तु स्थितियां अनुकूल ना होने के कारण आँठवी से आगे नही पढ़ पाए। बाद में घर पर ही संस्कृत, हिंदी, फारसी का अध्ययन किया। छायावादी काव्य प्रवृति के प्रमुख कवियों में ये एक थे। इनकी मृत्यु सन  1937 में हुई।

प्रमुख कार्य

काव्य-कृतियाँ – चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आंसू, लहर, और कामायनी।
नाटक – अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
उपन्यास – कंकाल, तितली और इरावती।
कहानी संग्रह – आकाशदीप, आंधी और इंद्रजाल।

कठिन शब्दों के अर्थ

  1. मधुप – मन रूपी भौंरा
  2. अनंत नीलिमा – अंतहीन विस्तार
  3. व्यंग्य मलिन – खराब ढंग से निंदा करना
  4. गागर-रीती – खाली घड़ा
  5. प्रवंचना – धोखा
  6. मुसक्या कर – मुस्कुरा कर
  7. अरुण-कोपल – लाल गाल
  8. अनुरागिनी उषा – प्रेम भरी भोर
  9. स्मृति पाथेय – स्मृति रूपी सम्बल
  10. पन्था – रास्ता
  11. कंथा – अंतर्मन

2. राम–लक्ष्मण–परशुराम संवाद – पाठ का सार

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

शिवधनुष टूटने के साथ सीता स्वयंवर की खबर मिलने पर परशुराम जनकपुरी में स्वयंवर स्थान पर आ जाते है। हाथ में फरसा लिए क्राेिधत हो धनुष तोड़ने वाले को सामने आने,  सहस्त्रबाहु की तरह दडिंत होने और न आने पर वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को मारे जाने की धमकी देते हैं। उनके क्रोध को शांत करने के लिए राम आगे बढ़कर कहते हैं कि धनुष-भंग करने का बड़ा काम उनका कोई दास ही कर सकता है। परशुराम इस पर और क्रोधित होते हैं कि दास होकर भी उसने शिवधनुष को क्यों तोड़ा। यह तो दास के उपयुक्त काम नहीं है। लक्ष्मण परशुराम को यह कहकर और क्रोधित कर देते हैं कि बचपन में शिवधनुष जैसे छोटे कितने ही धनुषों को उन्होंने तोड़ा, तब वे मना करने क्यो  नहीं आए आरै अब जब पुराना आरै कमजाोर धनुष् श्रीराम के हाथों में आते ही टूट गया तो क्यों क्रोधित हो रहे हैं। परशुराम जब अपनी ताकत से ध्रती को कई बार क्षत्रियों से हीन करके बा्र ह्मणों को दान देने और गर्भस्थ शिशुओं तक के नाश करने की बात बताते हैं तो लक्ष्मण उन पर शूरवीरों से पाला न पड़े जाने  का व्यंग्य करते हैं। वे अपने कुल की परंपरा में स्त्राी, गाय और ब्राह्मण पर वार न करके अपकीर्ति से बचने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ स्वयं को पहाड़ और परशुराम को एक  फूँक सिद्ध् करते हैं। ऋषि विश्वामित्रा परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए लक्ष्मण को बालक समझकर माफ करने का आगह्र करते है। वे समझाते है। कि राम आरै लक्ष्मण की शक्ति का परशुराम को अंदाजा नहीं है। अंत में लक्ष्मण के द्वारा कही गई गुरुऋण उतारने की बात सुनकर वे अत्यंत क्रुद्ध् होकर फरसा सँभाल लेते हैं। तब सारी सभा में हाहाकार मच जाता है आरै तब श्रीराम अपनी मधुर वाणी से परशुराम की क्रोध रूपी अग्नि को शांत करने का प्रयास करते हैं।

काव्यांशों की व्याख्या

नाथ संभुध्नु भंजनिहारा।
होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयेसु काह कहिअ किन मोही।
सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई
अरिकरनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा।
सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।
न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने।
बोले परसुधरहि अवमाने।।
बहु धनुही तोरी लरिकाईं।
कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
येहि धनु पर ममता केहि हेतू।
सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।

व्याख्या

स्वयंवर सभा में उपस्थित होकर जब परशुराम यह जानना चाहते हैं कि शिवधनुष को किसने तोड़ा है तो श्रीराम विनयपूर्वक अपने स्वाभाविक कोमल वचनों से उन्हें शांत करने की चेष्टा करते हैं। श्रीराम कहते हैं कि हे नाथ! आपके किसी दास के अलावा भला और कौन हो सकता है जो शिवजी के ध्नुष को तोड़ सकता है? इस प्रकार वे अपने आप को उनका सेवक कहते हैं, किंतु उनका क्रोध फिर भी शांत नहीं होता। तो उन्हें खुश करने के लिए श्रीराम पुनः कहते हैं कि यदि आज्ञा हो तो आप जो कुछ कहना चाहते हैं, मुझसे कहें। इस पर परशुराम अत्यंत क्राेिधत होकर बोले- ‘सेवक तो वही होता है जो सवेा का र्काइे कार्य करे, किंतु जो सेवक शत्राु समान कार्य करता है, उसके साथ तो लड़ाई करनी पड़ेगी। सुन लो राम! जिसने भी शिवधनुष तोड़ा है, सहस्रबाहु के समान ही मेरा शत्राु है। वह तुरंत समाज (सभा) से अलग बाहर हो जाए अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएंगे।’ परशुराम के इन क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर  लक्ष्मण मकुसराने लगे। अब लक्ष्मण ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘हे गोसाईं! बचपन में खेल-खेल में न जाने कितनी धनुहियाँ तोड  डालीं, तब तो आपको गुस्सा नहीं आया, पर अब ऐसी कौन-सी खास बात हो गई जिसके कारण आप इतने क्रोध्ति हो रहे हैं? आखिर इस धनुष की क्या विशेषता है जिसके कारण आपको इससे इतना प्रेम और लगाव है?’ लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण वचनों को सुनकर भृगुवंश की ध्वजा स्वरूप्परशुराम अत्यंत क्रोध्ति होकर बोले- ‘अरे  राजकुमार! तू काल के वश में होकर इस प्रकार की बात बोल रहा है। तुझे तो बोलने का होश भी नहीं है, तू अपने आप को सँभाल। भगवान शंकर का धनुष समस्त विश्व में प्रसिद्ध् है और तू इसकी तुलना सामान्य धनुहियों के साथ कर रहा है? अरे! अबोध् बालक, यह कोई सामान्य धनुष नहीं है।’

विशेष

  1.  यह काव्यांश अवधी भाषा में लिखित है।
  2.  इस चापैाई में शुरू में शातं रस आरै बाद में रादै्र रस का पय्रोग हुआ है।
  3.  काह कहिअ किन, सेवकु सो, करि करिअ, सहसबाहु सम सो, बिलगाउ बिहाइ में अनुप्रास अलंकार की छटा दिखाई देती है।
  4.  ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ और ‘धनुही सम त्रिपुरारिधनु’ में उपमा अलंकार है।

लखन कहा हसि हमरे जाना।
सुनहु देव सब धनुष समाना।।
का छति लाभु जून धनु तोरें।
देखा राम नयन के भोरें।।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू।
मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू । ।
बोले चितै परसु की ओरा।
रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
बालकु बोलि बधैं नहि तोही।
केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही।
बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही।
बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
सहसबाहुभुज छेदनिहारा।
परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

व्याख्या

जब लक्ष्मण ने परशुराम से हँसकर कहा, हे दवे ! सुनिए, हमारे लिए तो सभी धनुष समान हैं। पुराने और कमजोर धनुष के टूटने से क्या दोष और क्या लाभ? रामचंद्र जी ने तो इसे नया समझकर छुआ था और छूते ही वह धनुष टूट गया, उन्हें तो दृष्टि का धेखा हो गया, भला इसमें उनका क्या दोष? अतएव हे मुनिवर! आप व्यर्थ ही क्रोधित हो रहे हैं। 

अब परशुरामजी ने अपने फरसे की ओर देखते हुए कहा – ‘अरे शठ! तूने मेरे स्वभाव के बारे में नहीं सुना है। मैं तो भला तुझे बालक समझकर नहीं मार रहा और तू मुझे निरा सीध-सादा मुनि समझ रहा है। तो सुन ले – मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और अत्यंत क्रोधी हूँ। सारा संसार जानता है कि मैं क्षत्रियों का घोर शत्रु हूँ। मैंने इस पृथ्वी को क्षत्रिय-शून्य कर दिया, फिर इस क्षत्रिय-रहित पृथ्वी को ब्राह्मणों को दे दिया’ कहने का तात्पर्य यह है कि परशुराम ने अपनी शक्ति से असंख्य क्षत्रियों का नाश करके पृथ्वी पर ब्राह्मणों का आधिपत्य स्थापित कर दिया। आगे परशुराम लक्ष्मण को संबोध्ति करते हुए कहते हैं कि, ‘हे राजकुमार! सहस्रबाहु की भुजाओं को काट डालने वाले मेरे इस फरसे की ओर शरा देखो। मेरा फरसा गर्भस्थ शिशु को नष्ट करने की क्षमता रखता है। अतः हे राजपुत्रा! तू अपने माता-पिता को चिंतित मत कर, उन्हें सोचने के लिए मजबूर मत कर।’

विशेष

  1. इसमें अवधी भाषा का और चैपाई छंद का प्रयोग हुआ है।
  2. इसमें मुख्य रूप से रौद्र रस की प्रधनता है।
  3. इसमें तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘सठ सुनेहि सुभाउ’, ‘बालकु बोलिबधौं’, ‘बाल बह्र्मचारी’, ‘भुजबल भूमि भूप’ तथा ‘बिपुल बार’ में अनुप्रास अलंकार की निराली छटा है।
     

1. पद – पाठ का सार

कवि परिचय: सूरदास

सूरदास हिंदी साहित्य में भक्ति-काल के एक बड़े कवि हैं, जिन्हें सगुण भक्ति के महानायक माना जाता है। उनका जन्म लगभग सन् 1478 में हुआ और निधन 1583 में पारसौली में हुआ। सूरदास ने कई किताबें लिखीं, जिनमें “सूरसागर,” “साहित्य लहरी,” और “सूर सारावली” शामिल हैं, और “सूरसागर” सबसे प्रसिद्ध है। उन्होंने अपनी रचनाओं में वात्सल्य, श्रृंगार, और शांत रस को प्रमुखता से दर्शाया। उनकी कविता में ब्रजभाषा का सुंदर और निखरा हुआ रूप मिलता है। उनके अनुसार, सच्ची भक्ति ही मोक्ष पाने का सही रास्ता है, और उन्होंने भक्ति को ज्ञान से भी महत्वपूर्ण समझा। उनके काव्य में भक्ति, प्रेम, वियोग, और श्रृंगार की भावनाओं को बहुत सुंदरता से चित्रित किया गया है।

सूरदास

पद का सार

इस कविता में सूरदास जी ने भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के बीच के प्रेम और विरह को बहुत भावुकता से दिखाया है। जब कृष्ण मथुरा चले गए तो वे खुद नहीं लौटे, बल्कि अपने दोस्त उद्धव को संदेश देने भेजा। उद्धव ने गोपियों को ज्ञान और योग की बातें बताईं, लेकिन गोपियों को यह सब सुनकर दुख हुआ। वे तो बस कृष्ण के प्रेम में डूबी हुई थीं और उन्हें उनकी याद सताती थी। इसलिए गोपियाँ उद्धव से नाराज़ होकर उलटे-सीधे ताने मारने लगीं। उन्होंने कहा कि अगर उद्धव ने कभी सच्चा प्रेम किया होता, तो वे हमारी पीड़ा समझते। गोपियाँ कहती हैं कि उनका सारा प्यार मन में ही रह गया, और अब उद्धव का योग उन्हें कड़वे ककड़ी जैसा लगता है। अंत में वे कहती हैं कि कृष्ण अब राजनीति सीख गए हैं, इसलिए उन्होंने अपने पुराने प्यार को भुला दिया है। लेकिन वे याद दिलाती हैं कि सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा का दुख न बढ़ाए। यह कविता दिखाती है कि गोपियों का प्रेम सच्चा, गहरा और निस्वार्थ था।

सूरदास के पद: व्याख्या

पद 1

उधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी में पाँव न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।

व्याख्या: इन पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव से हँसी-हँसी में कहती हैं कि तुम बहुत ही किस्मत वाले हो जो कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से दूर रह गए। तुम ऐसे हो जैसे कमल का पत्ता जो पानी में तो होता है, पर गीला नहीं होता। जैसे तेल की घड़ी पानी में डाली जाए तो भी उस पर पानी की बूँद नहीं टिकती, वैसे ही तुम कृष्ण के साथ रहकर भी उनके प्रेम को नहीं समझ पाए। तुमने कभी प्रेम की नदी में पैर भी नहीं रखा। तुम तो बड़े समझदार हो, इसलिए प्रेम में नहीं डूबे। लेकिन हम तो भोली-भाली और सीधी-सादी हैं, इसलिए हम कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह खो गई हैं, जैसे चींटियाँ गुड़ की तरफ खिंचती हैं।

पद 2

मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि असार आस आवन की,तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि,बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उर तैं धार बही ।
‘सूरदास’अब धीर धरहिं क्यौं,मरजादा न लही।।

व्याख्या: इस पद में गोपियाँ कहती हैं कि उनके दिल की बात उनके दिल में ही रह गई, क्योंकि अब वे कृष्ण से अपनी बात खुद नहीं कह सकतीं। वे उद्धव को यह बात कहने के लिए ठीक नहीं मानतीं और साफ कहती हैं कि वे सिर्फ कृष्ण से ही अपना मन कहना चाहती थीं, किसी और से नहीं। वे बताती हैं कि उन्होंने बहुत समय तक कृष्ण के लौटने की उम्मीद में अपने दुख और विरह की पीड़ा को सहा, लेकिन अब जब कृष्ण ने खुद आने की बजाय सिर्फ ज्ञान और योग की बातें भेजीं, तो उनका दुख और बढ़ गया। वे कहती हैं कि जो इंसान दुख में होता है, वह अपने सहारे को याद करता है, लेकिन हमारे अपने ही (कृष्ण) आज हमारे दुख का कारण बन गए हैं। अब हमें धैर्य नहीं होता, क्योंकि जिस उम्मीद पर हम जी रहे थे, वह भी टूट गई। सच्चे प्रेम में बदले में प्रेम ही मिलना चाहिए, पर कृष्ण ने हमें धोखा दिया है और प्रेम की मर्यादा तोड़ दी है।

पद 3

हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम  बचन नंद -नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस – निसि, कान्ह- कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौपौं, जिनके मन चकरी ।।

व्याख्या: इस पद में गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके जीवन का सहारा हैं, जैसे हारिल पक्षी एक लकड़ी के टुकड़े को पकड़कर जीता है। उन्होंने अपने मन, बोल और कर्म से कृष्ण को ही अपना सब कुछ मान लिया है। वे बताती हैं कि दिन हो या रात, जागते हों या सपने में – हर समय उनका मन बस कृष्ण में ही लगा रहता है। उन्हें उद्धव का ज्ञान और योग का संदेश बिलकुल अच्छा नहीं लगता, वह उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा लगता है। गोपियाँ कहती हैं कि हमें तो पहले ही कृष्ण के प्रेम का रोग लग चुका है, अब हम तुम्हारे कहने पर योग वाला रास्ता नहीं अपना सकते क्योंकि हमने इसे कभी जाना ही नहीं। वे कहती हैं कि यह संदेश जाकर उन लोगों को दो जिनका मन चंचल हो, क्योंकि हमारा मन तो पहले ही पूरी तरह कृष्ण में लग चुका है।

पद 4

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं हीं, अब गुरु ग्रंथ पढाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपने  मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।

व्याख्या: इस पद में गोपियाँ हँसी में कहती हैं कि लगता है श्रीकृष्ण ने अब राजनीति सीख ली है। वे कहती हैं कि कृष्ण तो पहले से ही बहुत चालाक थे, लेकिन अब उन्होंने बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ लिए हैं जिससे उनकी समझ और तेज हो गई है। इसलिए उन्होंने हमारी हालत सब कुछ जानते हुए भी हमारे पास उद्धव को भेजा और योग का संदेश भिजवाया। गोपियाँ कहती हैं कि इसमें उद्धव का कोई दोष नहीं है, वे तो अच्छे इंसान हैं जो दूसरों की मदद करना चाहते हैं। फिर वे कहती हैं कि उद्धव, जब मथुरा लौटो तो कृष्ण से कह देना कि जब वे मथुरा जा रहे थे तब वे हमारा मन भी साथ ले गए थे, अब उसे वापस कर दें। वे तो मथुरा में बुरे लोगों को सज़ा देने गए हैं, लेकिन खुद ही हमारे साथ अन्याय कर रहे हैं। गोपियाँ कहती हैं कि एक अच्छा राजा वही होता है जो अपनी प्रजा का ख्याल रखे और उन्हें दुख न दे, यही असली राजधर्म है।

पद से शिक्षा

इन चार पदों से हमें यह सिखने को मिलता है कि सच्चा प्रेम दिल से होता है, न कि केवल बुद्धि या ज्ञान से। गोपियाँ कृष्ण से बहुत प्रेम करती थीं, इसलिए वे कृष्ण के द्वारा भेजे गए योग और ज्ञान के संदेश को पसंद नहीं करतीं। उन्हें लगता है कि जो खुद कभी प्रेम में नहीं पड़ा, वह विरह (जुदाई) का दुख नहीं समझ सकता। वे कहती हैं कि उन्होंने अपने मन, वचन और कर्म से सिर्फ कृष्ण को ही चाहा है और उसी प्रेम में जी रही हैं। गोपियाँ यह भी मानती हैं कि कृष्ण अब राजनीति सीख गए हैं और प्रेम की भावनाओं को भूल गए हैं। वे उद्धव को याद दिलाती हैं कि सच्चा धर्म वही है जो दूसरों का भला करे और किसी को दुख न दे। इन पदों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा प्रेम त्याग, धैर्य और समर्पण से भरा होता है, और जो दूसरों की भावनाओं को समझता है वही वास्तव में महान होता है।

शब्दार्थ

  • ऊधौ: उद्धव (श्रीकृष्ण के मित्र)
  • अति: बहुत / अत्यधिक
  • बड़भागी: भाग्यवान, खुशकिस्मत
  • अपरस: अछूता, अनासक्त
  • सनेह: प्रेम
  • तगा: धागा / बंधन
  • नाहिन: नहीं
  • अनुरागी: प्रेमी, प्रेम करने वाला
  • पुरइनि पात: कमल का पत्ता
  • दागी: दाग लगाना
  • ज्यौं: जैसे
  • माहँ: के अंदर
  • गागरि: मटका
  • ताकौं: उसको
  • प्रीति नदी: प्रेम की नदी
  • पाउँ: पैर
  • बोरयौ: डुबोया
  • दृष्टि: नजर
  • परागी: मोहित होना
  • अबला: कमजोर नारी
  • भोरी: भोली
  • गुर चाँटी ज्यौं पागी: जैसे चींटी गुड़ से चिपक जाती है
  • माँझ: के अंदर
  • जाइ: जाकर
  • कौन पै: किससे
  • अवधि: समय
  • अधार: सहारा
  • आस: आशा
  • आवन: आना
  • बिथा: पीड़ा
  • जोग सँदेसनि: योग के संदेश
  • बिरहिनि: वियोगिनी, विरह में रहने वाली
  • बिरह दही: विरह की अग्नि में जलना
  • हुतीं: होतीं
  • गुहारि: पुकार
  • जितहि तैं: जहाँ से
  • उत तैं: वहाँ से
  • धार: प्रवाह / धारा
  • धीर: धैर्य
  • धरहिं: रखें
  • मरजादा: मर्यादा
  • लही: मिली
  • हरि: श्रीकृष्ण
  • हारिल: एक पक्षी जो लकड़ी पकड़कर उड़ता है
  • लकरी: लकड़ी
  • क्रम: कर्म / कार्य
  • नंदन: नंद का पुत्र (श्रीकृष्ण)
  • उर: हृदय
  • दृढ़: मजबूत
  • पकरी: पकड़ी
  • जागत: जागना
  • सोवत: सोना
  • स्वप्न: सपना
  • दिवस: दिन
  • निसि: रात
  • जक री: रटती हूँ
  • जोग: योग
  • करुई: कड़वी
  • ककरी: ककड़ी
  • सु: वह
  • ब्याधि: रोग
  • तिनहिं: उन्हें
  • चकरी: चंचल
  • राजनीति पढ़ि आए: राजनीति सीखकर आए
  • मधुकर: भौंरा (यहाँ उद्धव के लिए कहा गया है)
  • समुझी: समझ कर
  • पाए: पाया
  • अति चतुर: बहुत बुद्धिमान
  • पठाए: भेजे
  • बढ़ी बुद्धि: बढ़ी हुई समझ
  • जानी: समझा
  • पर हित: दूसरों का भला
  • डोलत धाए: घूमते फिरते थे
  • पाइहैं: पाएँगे
  • आपुन: अपने
  • अनीति: अन्याय
  • राज धरम: राजा का धर्म (प्रजा की रक्षा करना)
  • न जाहिं सताए: न सताई जाए

3. टोपी शुक्ला – Long Question answer

प्रश्न 1: एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को किन भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा? मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
 टोपी नवीं कक्षा में दो बार फ़ेल हो गया। एक ही कक्षा में दो-दो बार बैठने से टोपी को अनेक भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वह अकेला पड़ गया था क्योंकि उसके दोस्त दसवीं कक्षा में थे और नई कक्षा में से कोई उसका दोस्त न बन सका था। वह अध्यापकों की हँसी का पात्र बनता चला गया। अध्यापक जब भी किसी न पढ़ने वाले बच्चे को टोकते तो हमेशा उसी का उदाहरण देते, ‘क्यों क्या बात है? राम अवतार (या कोई भी बच्चा ) बलभद्र की तरह इसी दर्जे में टिके रहना चाहते हो। इस पर वह शर्म से बिल्कुल पानी-पानी हो जाता और बाकी बच्चे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगते। अपनी कक्षा में वह अच्छा खासा बूढ़ा नज़र आता था। अपने भरे-पूरे घर की तरह अब वह स्कूल में भी बिल्कुल अकेला हो गया था। मानवीय मूल्यों की दृष्टि से देखा जाए, तो किसी की भावनाओं को इस प्रकार से ठेस पहुँचाना, उसे प्रताड़ित करना सर्वथा अनुचित है। ऐसे समय में माता-पिता ही नहीं समाज और शिक्षकवर्ग सभी को एक सकारात्मक भूमिका निभानी पड़ेगी। सफलता या असफलता जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। किसी एक परीक्षा में असफल होने से हमारा जीवन रुकता नहीं, वहाँ से तो जीवन को एक नई दिशा और अधिक सुदृढ़ता के साथ देने की आवश्यकता है । आज विद्यार्थियों के दिलों-दिमाग़ में यह बात और अधिक सुदृढ़ता से स्थापित करने की आवश्यकता है। तभी परीक्षा परिणामों के बाद होने वाली आत्महत्याओं को रोकने में समाज एक सकारात्मक पहल कर सकेगा।

प्रश्न 2: ‘अलग-अलग धर्म और जाति मानवीय रिश्तों में बाधक नहीं होते।’ ‘टोपी शुक्ला’ पाठ के आलोक में प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर: 
‘अलग-अलग धर्म और जाति मानवीय रिश्तों में बाधक नहीं होते।’ लेखक डॉ० राही मासूम रज़ा ने अपने उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ में इसी विचारधारा को प्रतिपादित किया है । लेखक ने बताया है कि टोपी कट्टर हिंदू परिवार से तथा इफ़्फ़न कट्टर मौलवी परिवार से संबंध रखता था, किंतु फिर भी टोपी और इफ़्फ़न की दादी में एक अटूट मानवीय रिश्ता था । दोनों आपस में स्नेह के बंधन में बँधे थे। टोपी अपने घर में उपेक्षित था उसे इफ़्फ़न के घर में अपनापन मिलता था। दादी के आँचल की छाँव में बैठकर वह स्नेह का अपार भंडार पाता था। उसके लिए रीति-रिवाज, सामाजिक हैसियत, खान-पान आदि कोई महत्त्व नहीं रखता था। इफ़्फ़न की दादी भी भरे घर में अकेली थी, उनकी भावनाओं को समझने वाला भी घर में कोई नहीं था । अतः दोनों का रिश्ता धर्म और जाति की सीमाएँ पार कर प्रेम के बंधन में बँध गया। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे थे। लेखक ने हमें समझाया है कि जब मन की भावनाएँ मेल खा जाती हैं तो मज़हब और जाति के बंधन बेमानी हो जाते हैं। अतः स्पष्ट हो जाता है कि टोपी व इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग मज़हब और जाति के होने पर भी परस्पर प्रेम व स्नेह की अदृश्य डोर में बँधे हुए थे।

प्रश्न 3. टोपी एक सुविधा – संपन्न परिवार से था, फिर भी इफ़्फ़न की हवेली की तरफ उसके खिंचे चले जाने के क्या कारण थे? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:
 टोपी एक सुविधा संपन्न परिवार से था, फिर भी इफ़्फ़न की हवेली की तरफ़ वह बरबस खिंचा चला जाता था क्योंकि अपने भरे-पूरे घर में वह बिल्कुल अकेला था। उसकी भावनाओं को घर में कोई नहीं समझता था। दादी तो उसकी हर बात में कमी निकालती थीं। दादी उसकी भाषा पर भी उसे डाँटती थीं। माँ को उसकी इफ़्फ़न से दोस्ती पर नाराज़गी थी। बड़े भाई मुन्नी बाबू ने भी स्वयं कबाब खाकर उसका इल्ज़ाम टोपी पर लगाकर उसकी पिटाई करवा दी थी । छोटा भाई भैरव भी अक्सर उसे तंग करता रहता था । इन सबके विपरीत इफ़्फ़न और उसकी दादी से उसे अपनेपन का एहसास मिलता था। दादी तो उसे बहुत प्यार करती थी। वह जब भी इफ़्फ़न के घर जाता, दादी के पास ही बैठता था । टोपी की पूरबी बोली पर यदि इफ़्फ़न के परिवार का कोई सदस्य उसे छेड़ता, तो भी दादी टोपी का ही पक्ष लेती थीं। वे स्वयं भी पूरबी बोली बोलती थीं और इफ़्फ़न के साथ टोपी को भी कहानियाँ सुनाया करती थीं। इसी कारण टोपी ने बार-बार मना करने पर भी इफ़्फ़न की हवेली में जाना नहीं छोड़ा।

प्रश्न 4: इफ़्फ़न के घर जाने के लिए मना करने पर भी टोपी नहीं माना और पिटता रहा। क्यों? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
 टोपी एक सुविधा-संपन्न परिवार से था, फिर भी इफ़्फ़न की हवेली की तरफ़ वह बरबस खिंचा चला जाता था क्योंकि अपने भरे-पूरे घर में वह बिल्कुल अकेला था। उसकी भावनाओं को घर में कोई नहीं समझता था। दादी तो उसकी हर बात में कमी निकालती थीं। दादी उसकी भाषा पर भी उसे डाँटती थीं। माँ को उसकी इफ़्फ़न से दोस्ती पर नाराज़गी थी। बड़े भाई मुन्नी बाबू ने भी स्वयं कबाब खाकर उसका इल्ज़ाम टोपी पर लगाकर उसकी पिटाई करवा दी थी । छोटा भाई भैरव भी अक्सर उसे तंग करता रहता था । इन सबके विपरीत इफ़्फ़न और उसकी दादी से उसे अपनेपन का एहसास मिलता था। दादी तो उसे बहुत प्यार करती थी। वह जब भी इफ़्फ़न के घर जाता, दादी के पास ही बैठता था । टोपी की पूरबी बोली पर यदि इफ़्फ़न के परिवार का कोई सदस्य उसे छेड़ता, तो भी दादी टोपी का ही पक्ष लेती थीं। वे स्वयं भी पूरबी बोली बोलती थीं और इफ़्फ़न के साथ टोपी को भी कहानियाँ सुनाया करती थीं। इसी कारण टोपी ने बार-बार मना करने पर भी इफ़्फ़न की हवेली में जाना नहीं छोड़ा।

प्रश्न 5: प्रेम मानवीय रिश्तों की बुनियाद है।’ इसमें उभरने वाले जीवन मूल्यों को टोपी शुक्ला पाठ के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 टोपी शुक्ला नामक पाठ से ज्ञात होता है कि टोपी के घर में उसकी दादी उसके माता-पिता के अलावा एक बड़ा और एक छोटा भाई भी है। उसके घर में काम करने वाली सीता और केतकी नामक दो नौकरानियाँ हैं पर टोपी के लिए इस घर में कोई प्रेम नहीं है। टोपी को यह प्रेम अपने मित्र इफ़्फ़न उसकी दादी और अपने घर की नौकरानी सीता से मिलता है।
इस प्रेम के कारण जाति, धर्म, उम्र, पद, मालिक-नौकरानी का भेद नहीं आने पाता है। प्रेम के अभाव में वह अपने घरवालों से रिश्ता नहीं बना पाता है जबकि जहाँ उसे प्रेम मिलता है वहाँ नए रिश्ते बन जाते हैं। टोपी का अपने परिवार के सदस्यों से खून का रिश्ता है पर वहाँ प्रेम नहीं है और जहाँ रिश्ता नहीं है वहाँ प्रेम के कारण नए रिश्ते का अंकुरण हो जाता है। इस प्रकार नि:संदेह कहा जा सकता है कि प्रेम मानवीय रिश्तों की बुनियाद है।

प्रश्न 6: टोपी और इफ्फ़न की दादी के उस प्रेममयी आत्मीय संबंध का वर्णन कीजिए, जिसके कारण टोपी ने इफ्फ़न से कहा कि तुम्हारी दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती तो अच्छा होता।
उत्तर: 
टोपी और इफ़्फ़न की दादी अलग-अलग जाति-धर्म से संबंध रखती थी, पर उनमें इतना गहरा प्रेम और आत्मीय भाव था कि जाति-धर्म का बंधन इसके आगे कहीं ठहर न सका। दोनों ही एक-दूसरे का दुख-दर्द समझते थे। टोपी और दादी के संबंध को इफ्फ़न के दादा जीवित होते तो वह भी इस संबंध को बिलकुल उसी तरह न समझ पाते जैसे टोपी के घरवाले न समझ पाए थे।
दोनों अलग-अलग अधूरे थे। एक ने दूसरे को पूरा कर दिया था। दोनों प्यासे थे। एक ने दूसरे की प्यास बुझा दी थी। दोनों अपने घरों में अजनबी और भरे घर में अकेले थे। दोनों ने एक-दूसरे का अकेलापन मिटा दिया था। इसी प्रेममयी आत्मीय संबंध के कारण टोपी ने कहा कि तुम्हारी दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती तो अच्छा रहता।

प्रश्न 7: बच्चे प्यार के भूखे होते हैं। वे उसी के बनकर रह जाते हैं जिनसे उन्हें प्यार मिलता है। इससे आप कितना सहमत हैं? इफ्फ़न और उसकी दादी के संबंधों के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
इफ्फ़न के परिवार में उसकी दादी, उसके अब्बू-अम्मी और दो बहनें थीं। इफ़्फ़न को अपने अब्बू, अपनी अम्मी, अपनी बाजी और छोटी बहन नुजहत से भी प्यार था ही परंतु दादी से वह जरा ज्यादा प्यार किया करता था। अम्मी तो कभीकभार डाँट मार लिया करती थीं। बाजी का भी यही हाल था। अब्बू भी कभी-कभार घर को कचहरी समझकर फैसला सुनाने लगते थे।
नुजहत को जब मौका मिलता उसकी कापियों पर तसवीरें बनाने लगती थीं। बस एक दादी थी जिन्होंने कभी उसका दिल नहीं दुखाया। वह रात को भी उसे बहराम डाकू, अनार परी, बारह बुर्ज, अमीर हमजा, गुलबकावली, हातिमताई, पंच फुल्ला रानी की कहानियाँ सुनाया करती थीं। मैं इससे पूर्णतया सहमत हूँ कि बच्चे प्यार के भूखे होते हैं। और वे उसी के होकर रह जाते हैं, जिनसे उन्हें प्यार मिलता है।

प्रश्न 8: कुछ बच्चों को अपने माता-पिता के पद और हैसियत का कुछ ज्यादा ही घमंड हो जाता है। इसका मानवीय संबंधों पर क्या असर पड़ता है? इसे रोकने के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे? ‘टोपी शुक्ला’ पाठ के आलोक में लिखिए।
उत्तर:
 इफ्फ़न के पिता कलेक्टर थे। उनका तबादला हो जाने के कारण उनके स्थान पर नए कलेक्टर हरनाम सिंह आए। वे उसी बँगले में रहने लगे जिसमें इफ़्फ़न का परिवार रहता था। जब इफ़्फ़न को याद करके टोपी उस बँगले में पहुँचा तो चौकीदार ने उसे अंदर जाने दिया। वहाँ नए कलेक्टर के तीनों बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। उन्होंने टोपी से अभद्रता से बातचीत ही नहीं की बल्कि मारपीट भी की।
इतना ही नहीं, उन्होंने टोपी पर अपना अलसेशियन कुत्ता भी छोड़ दिया जिसके कारण टोपी को सात सुइयाँ लगवानी पड़ीं। ऐसा उन्होंने अपने कलेक्टर पिता के पद और हैसियत के घमंड में किया। मानवीय संबंधों पर इसका यह असर होता है कि वे चूर-चूर हो जाते हैं।
ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति और बढ़ते घमंड को रोकने के लिए बच्चों को प्रेम, सद्भाव, भाई-चारा, पारस्परिक सद्भाव, सभी को समान समझने की भावना, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए तथा इन मूल्यों को बनाए रखते हुए उनके सामने अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत करना चाहिए।

प्रश्न 9: टोपी शुक्ला के विचारों का समाज पर क्या प्रभाव था? उनके विचारों ने समाज में कैसे बदलाव लाया?
उत्तर: 
टोपी शुक्ला के विचार समाज में गहरा प्रभाव डाले। उनके विचारों ने समाज में सामाजिक जागरूकता बढ़ाई और लोगों को समाज में सुधार की दिशा में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने सामाजिक अन्याय, शोषण और दरिद्रता के खिलाफ आवाज उठाई, जिससे लोगों की सोच में बदलाव आया और समाज में सामाजिक सुधार की दिशा में कदम बढ़े।

प्रश्न 10: टोपी शुक्ला की कहानी से कैसे स्वानुभूति और आत्म-प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है? उनके व्यक्तिगत अनुभवों से कुछ उदाहरण दें।
उत्तर:
 टोपी शुक्ला की कहानी से स्वानुभूति और आत्म-प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है। उनके व्यक्तिगत अनुभवों में उनकी संघर्षों और संघर्षों के परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान की महत्वपूर्ण उपयोगिता होती है। उन्होंने अपने जीवन में उठे मुश्किलातों का सामना किया और उन्हें पार करने के लिए आत्म-संयम, संघर्षशीलता, और आत्म-नियंत्रण की महत्वपूर्णता सिखाई। उनके उदाहरण से हम यह सिख सकते हैं कि समस्याओं का सामना कैसे किया जा सकता है और आत्म-विश्वास कैसे बढ़ाया जा सकता है।

2. सपनों के–से दिन – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘सपनों के से दिन’ पाठ में लेखक को स्कूल जाने के नाम से उदासी क्यों आती थी? फिर भी कब और क्यों उसे स्कूल जाना अच्छा लगने लगा ?
उत्तर:
 ‘सपनों के से दिन’ पाठ में लेखक गुरदयाल सिंह कहते हैं कि उन्हें और उनके मित्रों को स्कूल जाना कभी अच्छा नहीं लगता था। पहली कच्ची श्रेणी से लेकर चौथी श्रेणी तक केवल कुछ लड़कों को छोड़कर लेखक और उसके साथी रोते-चिल्लाते ही स्कूल जाया करते थे। उनके मन में स्कूल के प्रति एक प्रकार का भय – सा बैठा हुआ था । उन्हें मास्टरों की डाँट फटकार का भय भी सताता रहता था। स्कूल उन्हें नीरस प्रतीत होता था। इसके बावजूद यही स्कूल उन्हें कुछ विशेष अवसरों पर अच्छा भी लगने लगता था । यह अवसर होता था स्काउटिंग के अभ्यास का । तब पीटी साहब अपना कठोर रूप भूलकर लड़कों के हाथों में नीली-पीली झंडियाँ पकड़ा देते थे। वे इन झंडियों को हवा में लहराने को कहते । हवा में लहराती ये झंडिया बड़ी अच्छी लगती थीं। जब पी०टी० साहब ‘शाबाश’ कहते, तब वे पी०टी० साहब लड़कों को बड़े अच्छे लगते थे। ऐसे अवसर पर लेखक और उनके साथियों को स्कूल जाना अच्छा लगने लगता था।

प्रश्न 2: ‘सपनों के-से दिन’ पाठ के आधार पर बताइए कि बच्चों का खेलकूद में अधिक रुचि लेना अभिभावकों को अप्रिय क्यों लगता था? पढ़ाई के साथ खेलों का छात्र जीवन में क्या महत्त्व है और इससे किन जीवन-मूल्यों की प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: 
‘सपनों के-से दिन’ पाठ में जिस समय का वर्णन हुआ है उस समय अधिकांश अभिभावक अनपढ़ थे। वे निरक्षर होने के कारण शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझते थे। इतना ही नहीं वे खेलकूद को समय आँवाने से अधिक कुछ नहीं मानते थे। अपनी इसी सोच के कारण, बच्चे खेलकूद में जब चोटिल हो जाते और कई जगह छिला पाँव लिए आते तो उन पर रहम करने की जगह पिटाई करते। वे शारीरिक विकास और जीवन-मूल्यों के उन्नयन में खेलों की भूमिका को नहीं समझते थे, इसलिए बच्चों को खेलकूद में रुचि लेना उन्हें अप्रिय लगता था।
छात्रों के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेलों का भी विशेष महत्त्व है। ये खेलकूद एक ओर हमारे शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक हैं, तो दूसरी ओर सहयोग की भावना, पारस्परिकता, सामूहिकता, मेल-जोल रखने की भावना, हार-जीत को समान समझना, त्याग, प्रेम-सद्भाव जैसे जीवन-मूल्यों को उभारते हैं तथा उन्हें मजबूत बनाते हैं। इन्हीं जीवन-मूल्यों को अपना कर व्यक्ति अच्छा इनसान बनता है।

प्रश्न 3: मास्टर प्रीतमचंद को स्कूल से निलंबित क्यों कर दिया गया ? निलंबन के औचित्य और उस घटना से उभरने वाले जीवन-मूल्यों पर अपने विचार लिखिए ।
उत्तर:
 एक दिन मास्टर प्रीतमचंद ने चौथी कक्षा के बच्चों को फ़ारसी का शब्द रूप याद करने के लिए दिया था। जब अगले दिन बच्चे उस शब्द-रूप को नहीं सुना पाए, तो प्रीतमचंद ने गुस्से में भरकर उन्हें मुर्गा बना दिया और बर्बरतापूर्वक उनकी पिटाई करने लगे, ऐसा करते हुए उन्हें हेडमास्टर शर्मा जी ने देख लिया। उनसे उनकी यह बर्बरता सहन नहीं हुई और उन्होंने उन्हें निलंबित कर दिया।
मेरे विचार में हेडमास्टर शर्मा जी वैसे बहुत अच्छे इंसान थे, किंतु इस घटना में उन्हें मास्टर प्रीतमचंद को निलंबित न करके इस बात का अहसास करवाना चाहिए था कि बच्चों के साथ इतनी क्रूरता बिलकुल भी उचित नहीं है । विद्यार्थियों के प्रति उनके इस क्रूर व्यवहार के लिए यदि पहले से ही उन्हें समझाया जाता या चेतावनी दी जाती, तो संभवतः वे ऐसा नहीं करते। ऐसा करने से हेडमास्टर शर्मा जी के क्षमाशीलता, सहानुभूति, उदारता जैसे जीवन मूल्यों का पता चलता और हो सकता है कि उनकी चेतावनी से ही मास्टर प्रीतमचंद सुधर जाते तथा उन्हें अपना सच्चा मार्गदर्शक मानने लगते।

प्रश्न 4: मास्टर प्रीतमचंद से डरने और नफरत करने के चार कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
 मास्टर प्रीतमचंद से अधिकतर बच्चे डरते थे और कहीं-न-कहीं उनके मन में पी०टी० सर के लिए घृणा की भावना भी थी। उसके बहुत सारे कारण थे। मास्टर प्रीतमचंद का स्वभाव अत्यंत कठोर था । अनुशासन स्थापित करने के नाम पर वे अत्यंत क्रूर हो जाते थे। बच्चों को शारीरिक दंड देना उनके लिए साधारण बात थी । यदि कोई बच्चा हलका सा हिल भी जाए तो मास्टर जी ‘चमड़ी उधेड़ देना’ वाला मुहावरा सही सिद्ध कर देते थे। पढ़ाते समय भी उनमें सहनशीलता का सर्वथा अभाव रहता था । पाठ याद न कर पाने की स्थिति में प्रायः छात्र उनकी क्रूरता के शिकार बन जाते थे। बच्चों के मन में उनके प्रति भय बैठ गया था। छोटे बच्चे तो उनकी कठोरता को झेल ही नहीं पाते थे । वे बच्चों को यमराज जैसे लगते थे। उनके इसी क्रूरतापूर्ण व्यवहार के कारण हेडमास्टर साहब ने उन्हें नौकरी से भी निकलवा दिया था । उनकी यह स्वभावगत थी कि वे न तो अपनी गलती को मानते थे और न ही उसके लिए क्षमा माँगने जाते थे। बच्चों के प्रति त्रुटि स्नेह और प्रेम का उनमें सर्वथा अभाव था। उनकी शाबाशी भी बस पी०टी० परेड के समय ही मिल पाती थी, अन्यथा वे छात्रों को प्रोत्साहित नहीं करते थे।

प्रश्न 5: ‘सपनों के-से दिन’ पाठ में हेडमास्टर शर्मा जी की, बच्चों को मारने-पीटने वाले अध्यापकों के प्रति क्या धारणा थी? जीवन-मूल्यों के संदर्भ में उसके औचित्य पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
 ‘सपनों के-से दिन’ पाठ में वर्णित हेडमास्टर शर्मा जी बच्चों से प्यार करते थे। वे बच्चों को प्रेम, अपनत्व, पुरस्कार आदि के माध्यम से बच्चों को अनुशासित रखते हुए उन्हें पढ़ाने के पक्षधर थे। वे गलती करने वाले छात्र की भी पिटाई करने के पक्षधर न थे। जो अध्यापक बच्चों को मारने-पीटने या शारीरिक दंड देने का तरीका अपनाते थे, उनके प्रति उनकी धारणा अच्छी न थी। ऐसे अध्यापकों के विरुद्ध वे कठोर कदम उठाते थे। ऐसे अध्यापकों को स्कूल में आने से रोकने के लिए वे उनके निलंबन तक की सिफ़ारिश कर देते थे।
हेडमास्टर शर्मा जी का ऐसा करना पूरी तरह उचित था, क्योंकि बच्चों के मन से शिक्षा का भय निकालने के लिए मारपीट जैसे तरीके को बच्चों से कोसों दूर रखा जाना चाहिए। मारपीट के भय से अनेक बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं तो बहुत से डरे-सहमें कक्षा में बैठे रहते हैं और पढ़ाई के नाम पर किसी तरह दिन बिताते हैं। ऐसे बच्चों के मन में अध्यापकों के सम्मान के नाम पर घृणा भर जाती है।

प्रश्न 6: मास्टर प्रीतमचंद को स्कूल से क्यों निलंबित कर दिया गया? निलंबन के औचित्य और उस घटना से उभरने वाले जीवन-मूल्यों पर विचार कीजिए।
उत्तर: 
मास्टर प्रीतमचंद सख्त अध्यापक थे। वे छात्रों की जरा-सी गलती देखते ही उनकी पिटाई कर देते थे। वे छात्रों को फ़ारसी पढ़ाते थे। छात्रों को पढ़ाते हुए अभी एक सप्ताह भी न बीता था कि प्रीतमचंद ने उन्हें शब्द रूप याद करके आने को कहा। अगले दिन जब कोई भी छात्र शब्द रूप न सुना सका तो उन्होंने सभी को मुरगा बनवा दिया और पीठ ऊँची करके खड़े होने के लिए कहा। इसी समय हेडमास्टर साहब वहाँ आ गए। उन्होंने प्रीतमचंद को ऐसा करने से तुरंत रोकने के लिए कहा और उन्हें निलंबित कर दिया।
प्रीतमचंद का निलंबन उचित ही था, क्योंकि बच्चों को इस तरह फ़ारसी क्या कोई भी विषय नहीं पढ़ाया जा सकता है। शारीरिक दंड देने से बच्चों को ज्ञान नहीं दिया जा सकता है। इससे बच्चे दब्बू हो जाते हैं। उनके मन में अध्यापकों और शिक्षा के प्रति भय समा जाता है। इससे पढ़ाई में उनकी रुचि समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 7: ‘सपनों के से दिन’ पाठ के आधार पर लिखिए कि अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई में रुचि क्यों नहीं थी? पढ़ाई को व्यर्थ समझने में उनके क्या तर्क थे? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर: 
‘सपनों के से दिन’ पाठ में लेखक ने बताया कि उस समय अधिकांश अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाई में कोई विशेष रुचि नहीं थी क्योंकि ज़्यादातर परिवार आर्थिक दृष्टि से विपन्न थे । वे पढ़ाई पर ज़्यादा खर्च नहीं कर सकते थे। उस समय में कॉपियों, पैंसिलों, होल्डरों और स्याही पर साल भर में एक-दो रुपए खर्च होते थे, लेकिन एक रुपए में एक सेर घी या एक मन गंदम (गेहूँ) आ जाता था इसलिए गरीब घरों के लोग पढ़ाई के स्थान पर बच्चों को अपने साथ काम करवाने लग जाते थे। साथ ही वे लोग यह भी सोचते थे कि स्कूल की पढ़ाई धीमी है और जीवन में किसी काम नहीं आएगी। इस पढ़ाई से तो अच्छा यही होगा कि वे अपने बच्चों को हिसाब-किताब सिखाकर मुनीमगिरी करवाएँ या फिर बच्चे खेती या दुकान में उनका हाथ बँटवाएँ।

प्रश्न 8: लेखक ने अपने विद्यालय को हरा-भरा बनाने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन किया है। इससे आपको क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर: 
लेखक के विद्यालय में अंदर जाने के रास्ते के दोनों ओर अलियार के बडे ढंग से कटे-छाँटे झाड उगे थे। उसे उनके नीम जैसे पत्तों की गंध अच्छी लगती थी। इसके अलावा उन दिनों क्यारियों में कई तरह के फूल उगाए जाते थे। इनमें गुलाब, गेंदा और मोतिया की दूध-सी कलियाँ होती थीं जिनकी महक बच्चों को आकर्षित करती थी। ये फूलदार पौधे विद्यालय की सुंदरता में वृद्धि करते थे। इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें भी अपने विद्यालय को स्वच्छ बनाते हुए हरा-भरा बनाने का प्रयास करना चाहिए। हमें तरह-तरह के पौधे लगाकर उनकी देखभाल करना चाहिए और विद्यालय को हरा-भरा बनाने में अपना योगदान देना चाहिए।

प्रश्न 9: आज की शिक्षा-व्यवस्था में विद्यार्थियों को अनुशासित बनाए रखने के लिए क्या तरीके निर्धारित हैं? ‘सपनों के से दिन’ पाठ में अपनाई गई विधियाँ आज के संदर्भ में कहाँ तक उचित लगती हैं? जीवन-मूल्यों के आलोक में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए ।
उत्तर: 
‘सपनों के से दिन’ पाठ के अनुसार विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए उन्हें डराया जाता था। छात्र पी०टी० के अध्यापक से बहुत डरते थे । वे छात्रों को बुरी तरह मारते-पीटते थे उनकी डाँट सुनकर छात्र थर-थर काँपते थे । उनके व्यवहार को दिखाने के लिए पाठ में ‘खाल खींचने’ जैसे मुहावरे का प्रयोग किया गया है उस समय की शिक्षा पद्धति में डाँट फटकार की बहुत अहमियत थी । शिक्षा भय की वस्तु समझी जाती थी । मुर्गा बनाना, थप्पड़ मारना, झिड़कना और डंडे मारना, उस समय ऐसे कठोर दंड थे कि जिनसे बालकों को न केवल शारीरिक कष्ट होता था, बल्कि उन्हें मानसिक यंत्रणा भी दी जाती थी ।
इन सबसे हटकर वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इस प्रकार के दंड का कोई प्रावधान नहीं है। अब छात्रों को मारना या पीटना कानूनी अपराध है । आजकल बच्चों को सुधारने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाए जाते हैं। इन तरीकों से उनके अंदर अनुशासन, आदर-भाव, सहयोग, परस्पर प्रेम, कर्मनिष्ठा आदि गुणों का विकास होता है । उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को पुरस्कार दिए जाते हैं। जो अपने आप में शिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया एक उत्तम कदम है। यूँ भी मारने-पीटने से बच्चों के मन में शिक्षा के प्रति अरुचि ही पैदा होती है। तनाव मुक्त एवं शांत सौहार्दपूर्ण वातावरण में दी गई शिक्षा अधिक जीवनोपयोगी सिद्ध होगी।

प्रश्न 10: लेखक और उसके साथियों द्वारा गरमी की छुट्टियाँ बिताने का ढंग आजकल के बच्चों द्वारा बिताई जाने वाली छुट्टियों से किस तरह अलग होता था?
उत्तर:
 लेखक और उसके साथी गरमी की छुट्टियाँ खेलकूद कर बिताते थे। वे घर से कुछ दूर तालाब पर चले जाते, कपड़े उतार पानी में कूद जाते और कुछ समय बाद, भागते हुए एक रेतीले टीले पर जाकर, रेत के ऊपर लेटने लगते। गीले शरीर को गरम रेत से खूब लथपथ कर उसी तरह भागते, किसी ऊँची जगह से तालाब में छलाँग लगा देते। रेत को गंदले पानी से साफ़ कर फिर टीले की ओर भाग जाते।
याद नहीं कि ऐसा, पाँच-दस बार करते या पंद्रह-बीस बार करते हुए आनंदित होते। आजकल के बच्चों द्वारा ग्रीष्मावकाश पूरी तरह अलग ढंग से बिताया जाता है। अब तालाब न रहने से वहाँ नहाने का आनंद नहीं लिया जा सकता। बच्चे घर में रहकर लूडो, चेस, वीडियो गेम, कंप्यूटर पर गेम जैसे इंडोर गेम खेलते हैं। वे टीवी पर कार्टून और फ़िल्में देखकर अपना समय बिताते हैं। कुछ बच्चे माता-पिता के साथ ठंडे स्थानों या पर्वतीय स्थानों की सैर के लिए जाते हैं।

1. हरिहर काका – Long Question answer

प्रश्न 1: ‘हरिहर काका’ नामक पाठ में लेखक ने ठाकुरबारी की स्थापना एवं उसके बढ़ते कलेवर के बारे में क्या बताया है?
उत्तर:
 ‘हरिहर काका’ नामक पाठ में लेखक ने ठाकुरबारी की स्थापना एवं उसके विशाल होते कलेवर के बारे में बताया है कि पहले जब गाँव पूरी तरह बसा नहीं था तभी कहीं से एक संत आकर इस स्थान पर झोंपड़ी बना रहने लगे थे। वह सुबहशाम यहाँ ठाकुर जी की पूजा करते थे। लोगों से माँगकर खा लेते थे और पूजा-पाठ की भावना जाग्रत करते थे। बाद में लोगों ने चंदा करके यहाँ ठाकुर जी का एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया। फिर जैसे-जैसे गाँव बसता गया और आबादी बढ़ती गई, मंदिर के कलेवर में भी विस्तार होता गया। लोग ठाकुर जी को मनौती मनाते कि पुत्र हो, मुकदमे में विजय हो, लड़की की शादी अच्छे घर में तय हो, लड़के को नौकरी मिल जाए। फिर इसमें जिनको सफलता मिलती, वह खुशी में ठाकुर जी पर रुपये, जेवर, अनाज चढ़ाते। अधिक खुशी होती तो ठाकुर जी के नाम अपने खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा लिख देते। यह परंपरा आज तक जारी है। इससे ठाकुरबारी का विकास हज़ार गुना अधिक हो गया।

प्रश्न 2: ठाकुरबारी से घर लौटने पर हरिहर काका के प्रति घर वालों का व्यवहार क्यों बदल गया ?
उत्तर: 
ठाकुरबारी से घर लौटने पर हरिहर काका के प्रति घरवालों का व्यवहार बदल गया क्योंकि उनके भाई उनकी जायदाद लेना चाहते थे इसलिए उनके भाई काका का अचानक आदर-सम्मान और सुरक्षा प्रदान करने लगे थे । हरिहर काका को अब दालान में नहीं, बल्कि एक बहुमूल्य वस्तु की तरह सँजोकर, छिपाकर घर के अंदर रखा गया था। उनकी सुरक्षा के लिए अपने रिश्तेदारों के यहाँ से अनेक सूरमाओं को बुला लिया गया । हथियार जुटा लिए गए थे। चौबीसों घंटे पहरे दिए जाने लगे थे क्योंकि उन्हें डर था कि किसी भी समय ठाकुरबारी के लोग हमला करके हरिहर काका को उठा न ले जाएँ। अगर किसी आवश्यक काम से हरिहर काका घर से बाहर गाँव में निकलते तो चार-पाँच लोग हथियारों से लैसे होकर उनके आगे-पीछे चलते। रात में चारों तरफ़ से घेरकर सोते । भाइयों ने डयूटी बाँट ली थीं। आधे लोग सोते तो आधे लोग जागकर पहरा देते रहते थे। रिश्ते-नाते के लोग उनको समझाने भी लगे थे कि अपनी ज़मीन अपने भतीजों के नाम लिख दें।

प्रश्न 3: ‘हरिहर काका के गाँव के लोग ठाकुरबारी और ठाकुर जी के प्रति अगाध भक्ति-भावना रखते हैं।’ हरिहर काका पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
 यूँ तो ठाकुरबारी में सदा ही भजन-कीर्तन होता रहता है, पर बाढ़ या सूखा जैसी आपदा की स्थिति में वहाँ तंबू लग जाता है और अखंडकीर्तन शुरू हो जाता है। इसके अलावा गाँव में पर्व-त्योहार की शुरुआत ठाकुरबारी से ही होती है। होली में सबसे पहले गुलाल ठाकुरजी को ही चढ़ाया जाता है। दीवाली का पहला दीप ठाकुरबारी में ही जलता है। जन्म, शादी और जनेऊ के अवसर पर अन्न-वस्त्र की पहली भेट ठाकुर जी के नाम की जाती है। ठाकुरबारी के ब्राह्मण-साधु व्रत-कथाओं के दिन घर-घर घूमकर कथावाचन करते हैं। लोगों के खलिहान में जब फ़सल की मड़ाई होकर अनाज की ढेरी’ तैयार हो जाती है, तब ठाकुर जी के नाम का एक भाग’ निकालकर ही लोग अनाज अपने घर ले जाते हैं।

प्रश्न 4: महंत द्वारा हरिहर काका का अपहरण महंत के चरित्र की किस सच्चाई को सामने लाता है तथा आपके मन में इससे ठाकुरबारी जैसी संस्थाओं के प्रति कैसी धारणा बनती है? बताइए ।
उत्तर: 
महंत द्वारा हरिहर काका का अपरण करवाना उसकी दबंगाई, मौकापरस्ती, लालची, और अनैतिक कार्य करने के लिए तत्पर रहने वाले व्यक्ति की छवि हमारे सामने उभरती है। जो साधु के वेश में ठग है। ऐसे धूर्त लोगों को देख कर, हमारे मन में ठाकुरबारी सदृश संस्थाओं के लिए यही धारणा बनती है कि बदलते परिवेश के साथ ये भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं। अब यहाँ जाकर मनुष्य की आत्मा धैर्य, सुख, शांति प्राप्त नहीं करती। वह इस बात से भयभीत रहती है कि कहीं हरिहर काका जैसी स्थिति हमारी भी न हो जाए। लोभ-लालच और षड्यंत्रों में फँसे साधु-संतों के आचरण से युवा पीढ़ी पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। धार्मिक संस्थाओं और समाज की उच्च आदर्शवादिता से उनका विश्वास उठने लगता है जो किसी भी समाज के लिए हितकारी नहीं है।

प्रश्न 5: लोभी महंत एक ओर हरिहर काका को यश और बैकुंठ का लोभ दिखा रहा था तो दूसरी ओर पूर्व जन्म के उदाहरण द्वारा भय भी दिखा रहा था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
हरिहर काका को समझाते हुए लोभी महंत कह रहा था कि तुम अपने हिस्से की जमीन ठाकुरबारी के नाम लिखकर स्वर्ग प्राप्त करोगे। तुम्हारी कीर्ति तीनों लोकों में फैल जाएगी और सूरज-चाँद के रहने तक तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। इससे साधु-संत भी तुम्हारे पाँव पखारेंगे। सभी तुम्हारा यशोगान करेंगे और तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाएगा। ठाकुर जी के साथ ही तुम्हारी भी आरती गाई जाएगी। महंत उनसे कह रहा था कि पता नहीं पूर्वजन्म में तुमने कौन-सा पाप किया था कि तुम्हारी दोनों पत्नियाँ अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं। तुमने औलाद का मुँह तक नहीं देखा। अपना यह जन्म तुम अकारथ न जाने दो। ईश्वर को एक भर दोगे तो दस भर पाओगे। मैं अपने लिए तो तुमसे माँग नहीं रहा हूँ। तुम्हारा यह लोक और परलोक दोनों बन जाएँ, इसकी राह तुम्हें बता रहा हूँ।

प्रश्न 6: हरिहर काका के साथ उनके भाइयों तथा ठाकुरवाड़ी के महंत ने कैसा व्यवहार किया? क्या आप इसे उचित मानते हैं। तर्क सहित लिखिए ।
उत्तर:
 काका के साथ उनके भाइयों ने तथा ठाकुरवारी के महंत ने बहुत बुरा व्यवहार किया। उनकी नज़र काका की ज़मीन पर थी । पहले तो उन दोनों ने काका की देखभाल की, काका की आवभगत की, परंतु उन्हें जब यह यकीन हो गया कि काका जीते-जी अपनी ज़मीन किसी के नाम नहीं करेंगे, तो वे दोनों काका की जान के दुश्मन बन गए।
ठाकुरवारी के महंत ने काका को मारा और ज़बरदस्ती सादे तथा कुछ लिखे हुए कागज़ों पर उनके अंगूठे के निशान ले लिए। इसी प्रकार काका के भाइयों व उनकी पत्नियों ने काका के साथ हाथापाई की। अगर पुलिस नहीं आती, तो परिवार वाले काका की हत्या भी कर देते । अतः यह स्पष्ट कहा जा सकता है। कि उन दोनों का ही व्यवहार क्रूर व संवेदनहीन था और काका के प्रति उनका व्यवहार निंदनीय, अमानवीय अनुचित था ।

प्रश्न 7: हरिहर काका के लिए उनकी ज़मीन जी का जंजाल कैसे बन गई?
उत्तर: 
हरिहर काका के पास पंद्रह बीघे ज़मीन थी । हरिहर काका की अपनी कोई संतान नहीं थी इसलिए सबकी नज़र हरिहर काका की ज़मीन पर थी । हरिहर काका के तीनों भाइयों एवं उनके परिवार वालों की बुरी नज़र हरिहर काका की ज़मीन पर थी। उन सभी लोगों की लालच की भावना इतनी बढ़ गई थी कि वे सभी हरिहर काका की लम्बी उम्र की दुआ करने के बजाए उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे । हरिहर काका उन्हें बोझ लगने लगे । अवसर देखकर गाँव के ठाकुरबारी के महंत ने हरिहर काका को बुरी तरह मारा-पीटा और अनेक कागज़ों पर ज़बरन अंगूठे के निशान ले लिए।
इस घटना के दौरान ठाकुरबारी के साधु संतों ने हरिहर काका का अपहरण कर लिया, उनको कमरे में बाँध कर भूखा-प्यासा रखा। उन साधु संतों ने हरिहर काका की ज़मीन को हड़पने के लिए गोलियाँ तक चलाई। बड़ी मुश्किल से हरिहर काका जी जान बची। वे वहाँ से किसी प्रकार छूटकर भाइयों के पास आए । उनके भाइयों की भी कुदृष्टि (बुरीनज़र ) काका के हिस्से वाली ज़मीन पर थी। उसी ज़मीन को हथियाने के लिए उनके भाइयों ने हरिहर काका को बहुत मारा-पीटा। यहाँ तक कि उन्हें जान से मारने की कोशिश की और ज़बरदस्ती उनके अंगूठे के निशान अनेक कागज़ों पर ले लिए। यहाँ भी हरिहर काका की जान बाल-बाल बची। इन्हीं कारणों से सारे गाँव में हरिहर काका चर्चा का विषय बन गए थे। गाँव के लोगों की नज़र भी हरिहर काका की ज़मीन पर थी। उपरोक्त कथनों के आधार पर यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि उनकी ज़मीन ही उनके जी का जंजाल बन चुकी थी ।

प्रश्न 8: महंत की बातें सुनकर हरिहर काका किस दुविधा में फँस गए? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
महंत की बातें सुनकर हरिहर काका अपनी जमीन किसे दें-भाइयों को या ठाकुर जी के नाम लिखें; इस दुविधा में फैंस गए। वे सोचने लगे कि पंद्रह बीघे खेत की फ़सल भाइयों के परिवार को देते हैं, तब तो कोई पूछता नहीं, अगर कुछ न दें तब क्या हालत होगी? उनके जीवन में तो यह स्थिति है, मरने के बाद कौन उन्हें याद करेगा? सीधे-सीधे उनके खेत हड़प जाएँगे। ठाकुर जी के नाम लिख देंगे तो पुश्तों तक लोग उन्हें याद करेंगे। अब तक के जीवन में तो ईश्वर के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। अंतिम समय तो यह बड़ा पुण्य कमा लें, लेकिन यह सोचते हुए भी हरिहर काका का मुँह खुल नहीं रहा था। भाई का परिवार तो अपना ही होता है। उनको न देकर ठाकुरबारी में दे देना उनके साथ धोखा और विश्वासघात होगा।

प्रश्न 9: आप हरिहर काका के भाई की जगह होते तो क्या करते?
उत्तर:
 यदि मैं हरिहर काका के भाई की जगह पर होता तो हरिहर काका से पूर्णतया सहानुभूति रखता। मैं मन में यह सदा बिठाए रखता कि हरिहर काका की पत्नी इस दुनिया में नहीं हैं और न उनकी अपनी कोई संतान । परिवार का सदस्य और सहोदर भाई होने के कारण मैं उनके मन में यह भावना आने ही न देता कि वे भरे-पूरे परिवार में अकेले होकर रह गए हैं। मैं उनके खाने और उनकी हर सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखता। ऐसा मैं उनकी ज़मीन-जायदाद के लोभ में नहीं करता, बल्कि पारिवारिक सदस्य सहोदर भाई होने के अलावा मानवता के आधार पर भी करता। मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों से काका के साथ अच्छा व्यवहार करने के लिए कहता ताकि उन्हें ठाकुरबारी जैसी जगह जाने और महंत जैसे ढोंगियों के बहकावे में आने की स्थिति ही न आती। मैं उन्हें खाना-खिलाकर स्वयं खाता तथा उनके साथ कोई भेदभाव न होने देता।

प्रश्न 10: महंत जी ने हरिहर काका को एकांत कमरे में बैठाकर प्रेम से क्या समझाया ? अपने शब्दों में लिखिए ।
उत्तर:
 महंत जी ने एकांत कमरे में हरिहर काका को बैठाकर यह समझाया कि ये रिश्ते-नाते स्वार्थ पर टिके होते हैं। महंत ने हरिहर काका की खूब सेवा की, खूब आवभगत की। महंत ने विभिन्न प्रकार का लालच देकर काका से ज़मीन हथियाने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाए, ताकि काका अपनी ज़मीन ठाकुरवारी के नाम कर दें। महंत ने काका से कहा कि ठाकुरबारी के नाम ज़मीन करने से उन्हें पुण्य मिलेगा और वे सीधा स्वर्ग सिधारेंगे। जब यह ठाकुरबारी रहेगी तब तक आपका नाम भी इसके साथ जुड़ा होगा और इसका फल तुम्हें अगले जन्मों तक मिलेगा इस तरह से महंत ने काका से ज़बरदस्ती कागज़ पर अंगूठे के निशान ले लिए।