04. जननी तुल्यवत्सला – Chapter Explanation
1. कश्चित् कृषकः बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्। तयोः बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्। अतः कृषकः तं दुर्बलं वृषभं तोदनेन नुद्यमानः […]
1. कश्चित् कृषकः बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्। तयोः बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्। अतः कृषकः तं दुर्बलं वृषभं तोदनेन नुद्यमानः […]
1. (सिंहासनस्थः रामः। ततः प्रविशतः विदूषकेनोपदिश्यमानमार्गों तापसौ कुशलवी)विदूषकः – इत इत आयौं!कुशलवी – (रामस्य समीपम् उपसृत्य प्रणम्य च) अपि कुशल
1. अस्ति देउलाख्यो ग्रामः। तत्र राजसिंहः नाम राजपुत्रः वसति स्म। एकदा केनापि आवश्यककार्येण तस्य भार्या बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता पितुर्गृहं प्रति चलिता।
1. दुर्वहमत्र जीवितं जातं प्रकृतिरेव शरणम्।शुचि-पर्यावरणम्॥महानगरमध्ये चलदनिशं कालायसचक्रम्।मनः शोषयत् तनुः पेषयद् भ्रमति सदा वक्रम्॥दुर्दान्तैर्दशनैरमुना स्यान्नैव जननसनम्। शुचि… ॥1 ॥शब्दार्था: दुर्वहम्
अन्योक्तयः पाठपरिचयः अन्योक्ति अर्थात किसी की प्रशंसा अथवा निन्दा अप्रत्यक्ष रूप से अथवा किसी बहाने से करना। जब किसी प्रतीक
भूकम्पविभीषिका पाठपरिचयः हमारे वातावरण में भौतिक सुख-साधनों के साथ-साथ अनेक आपदाएँ भी लगी रहती हैं। प्राकृतिक आपदाएँ जीवन को अस्त-व्यस्त
चेन्नई नगर के समुद्रतट पर महाकवि तिरुवल्लुवर की प्रतिमा है। इन्होंने तिरुक्कुरल् नामक एक पावन ग्रन्थ की रचना की है।
प्रस्तुत पाठ श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। यह कथा प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश-रूप
आधुनिक युग में भौतिक सुखों में जकड़ा हुआ मानव अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए अन्यों का अहित और तिरस्कार करने
संस्कृत साहित्य में जिन पद्यों (श्लोकों) में सार्वभौमिक सत्य को सुचारु रूप से प्रस्तुत किया है उनको ‘सुभाषित’ कहा जाता