14. किसान की होशियारी – पाठ का सार

परिचय

इस कहानी में एक चतुर किसान और एक भालू के बीच के संवाद को दिखाया गया है। कहानी का मुख्य विषय फसल का बंटवारा है, जिसमें दोनों पात्र अपने-अपने हिस्से के लिए समझौता करते हैं। किसान अपनी बुद्धिमत्ता से भालू को बार-बार मात देता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि चतुराई और समझदारी से किसी भी बड़ी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।

व्याख्या

कहानी का प्रारंभ और प्रस्ताव

 एक साधारण दिन में, जब किसान खेत में काम कर रहा होता है, तभी अचानक एक भालू उस पर हमला करने आ जाता है। किसान, भालू को रोकने के लिए और स्थिति को संभालने के लिए, उसे फसल का हिस्सा देने की पेशकश करता है। इससे किसान न केवल खुद को बचाता है बल्कि भालू को भी समझौते में शामिल करता है।

पहला समझौता – आलू की फसल

भालू, फसल के ऊपरी हिस्से को चुनता है, जिस पर किसान चतुराई से आलू बोता है। आलू एक ऐसी फसल है जिसका खाने योग्य हिस्सा जमीन के नीचे होता है और पत्तियाँ ऊपर होती हैं। इस चतुराई से किसान भालू को सिर्फ सूखे पत्ते थमा देता है, जबकि सारे आलू अपने पास रख लेता है।

भालू की प्रतिक्रिया और दूसरा समझौता

जब भालू को पता चलता है कि उसे खाली हाथ छोड़ दिया गया है, वह बहुत निराश होता है और अगली बार फसल के नीचे के हिस्से को चुनता है। इस बार किसान गेहूं बोता है, जिसमें दाने ऊपर होते हैं और जड़ें नीचे होती हैं।

किसान का दूसरी बार जीतना

जब गेहूं की फसल तैयार होती है, तो किसान को दाने मिलते हैं और भालू को फिर से बेकार की जड़ें मिलती हैं। भालू इस बार भी ठगा हुआ महसूस करता है, और उसे यह एहसास होता है कि किसान ने फिर से उसे चतुराई से मात दी है।

तीसरा समझौता

 भालू अब फसल के ऊपरी और निचले हिस्से दोनों की मांग करता है। इस बार किसान गन्ना लगाता है, जिसका उपयोगी हिस्सा मध्य में होता है। फसल तैयार होने पर, भालू को फिर से निराशा हाथ लगती है क्योंकि उसे केवल गन्ने के ऊपरी पत्ते और निचली जड़ें मिलती हैं, जबकि सारा मीठा हिस्सा किसान के पास रहता है।

भालू का अंतिम समझ

 इस घटना के बाद भालू समझ जाता है कि किसान ने उसे कैसे चालाकी से हराया है। वह किसान की बुद्धिमत्ता की सराहना करता है और उससे सीखने की कोशिश करता है। भालू ने इस अनुभव से यह सीखा कि सिर्फ शक्ति ही सब कुछ नहीं होती, बुद्धिमत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

सारांश

कहानी “किसान की होशियारी” हमें सिखाती है कि कैसे बुद्धि और चतुराई से बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है। किसान के जैसे, हमें भी समस्याओं का समाधान चतुराई से करना चाहिए और कभी भी परिस्थितियों के आगे हार नहीं माननी चाहिए। यह कहानी यह भी दिखाती है कि कैसे अनुभव और ज्ञान हमें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

13.  पेड़ों की अम्मा थिम्मक्का – पाठ का सार

परिचय

इस कहानी में हम ‘सल्मरदा सथमकका’ के बारे में जानेंगे, जिन्हें लोग ‘अम्मा’ और ‘वृक्षमाता’ के नाम से भी जानते हैं। वह कर्नाटक की रहने वाली हैं और उन्होंने अपने जीवन में 8000 से अधिक पेड़ लगाए हैं।

व्याख्या

सथमकका को लोग ‘अम्मा’ और ‘वृक्षमाता’ के नाम से भी जानते हैं। वह कर्नाटक के तुमकुर जिले में पैदा हुई थीं और वहीं बड़ी हुईं। अम्मा ने बहुत सारे पेड़ लगाए और अपने आस-पास के जगह को सुंदर बनाया।

जब वह छोटी थीं, तब से ही उन्होंने पेड़ लगाना शुरू कर दिया था। उन्होंने 8000 से भी ज्यादा पेड़ लगाए हैं। अम्मा को पेड़ बहुत पसंद थे और वह चाहती थीं कि सब जगह हरियाली हो।

अम्मा ने अपने 107 वर्ष की उम्र में भी काम करना जारी रखा। इस उम्र में भी वह बहुत सक्रिय रहती हैं और पेड़ लगाने का उनका जुनून कम नहीं हुआ है। वह यह दिखाती हैं कि उम्र सिर्फ एक संख्या है, और अगर हमारे अंदर जुनून हो तो हम किसी भी उम्र में कुछ भी कर सकते हैं।

अम्मा को यह काम करने में कई मुश्किलें आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बहुत मेहनत की और लोगों को भी पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया।

उनके इस महान काम के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया। यह बहुत बड़ा सम्मान होता है और यह उनके कड़ी मेहनत की वजह से मिला।

सारांश

अम्मा की कहानी हमें बहुत कुछ सिखाती है। उन्होंने हमें दिखाया कि कैसे लगन और मेहनत से हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी उम्र की परवाह किए बिना अपने सपनों के पीछे भागना चाहिए। अम्मा ने हमें यह भी सिखाया कि पर्यावरण की देखभाल करना कितना जरूरी है। उनकी मेहनत और समर्पण हमें प्रेरित करते हैं कि हम भी अपने आस-पास की दुनिया को बेहतर बनाने के लिए काम करें।

12. अपना अपना काम – पाठ का सार

कहानी का परिचय

इस अध्याय में हम सिमरन की कहानी पढ़ेंगे, जो अपनी पढ़ाई से थक गई है और चाहती है कि वह भी उड़ने वाली एक मधुमक्खी बन जाए। यह कहानी हमें बताती है कि हर काम में मेहनत होती है, चाहे वह पढ़ाई हो या फिर मधुमक्खी का उड़ना।

कहानी की व्याख्या

सिमरन हमेशा पढ़ाई में व्यस्त रहती है जिसे वाह थक जाती है इसलिए उसने एक दिन उसने सोचा कि काश वह भी मधुमक्खी की तरह खुले आसमान में उड़ सकती। उसे लगा कि मधुमक्खियों का जीवन कितना आसान होगा, सिर्फ उड़ते रहना और फूलों से शहद इकट्ठा करना।

लेकिन जब सिमरन ने गौर से देखा तो उसे समझ में आया कि मधुमक्खियों को भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है। वे दिन भर फूलों से फूलों तक उड़ती रहती हैं और शहद बनाने के लिए पराग को इकट्ठा करती हैं। यह काम इतना आसान नहीं होता जितना सिमरन ने सोचा था।

इसके बाद सिमरन ने पेड़ की ओर देखा और सोचा कि पेड़ होना कितना आरामदायक होता। लेकिन पेड़ ने उसे बताया कि वह भी बिना रुके काम करता है, उसकी जड़ें पानी खींचती हैं और पत्तियां भोजन बनाती हैं।

फिर सिमरन ने चिड़ियों को देखा, जो दाना खोजने में दिनभर उड़ती रहती थीं। चिड़िया ने बताया कि उसे एक-एक दाना खोजने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है और घोंसला बनाने के लिए भी बहुत परिश्रम करना पड़ता है।

यह सब जानने के बाद, सिमरन को समझ आया कि हर कोई अपने-अपने काम में मेहनत करता है। चाहे वह मधुमक्खी हो या पेड़, हर किसी का काम महत्वपूर्ण और मेहनत भरा होता है। सिमरन ने सोचा कि अगर सभी मेहनत करते हैं, तो उसे भी अपनी पढ़ाई में मन लगाना चाहिए और पूरी मेहनत से अपना काम करना चाहिए।

कहानी का सारांश

इस कहानी से सिमरन ने सीखा कि हर काम मेहनत से होता है। चाहे मधुमक्खी हो या पेड़, सबको अपना काम करने में मेहनत करनी पड़ती है। सिमरन को समझ आया कि पढ़ाई भी मेहनत का काम है और उसे मन लगाकर करनी चाहिए। इस कहानी से हम सीखते हैं कि मेहनत और धैर्य से ही सफलता मिलती है।

11. एक जादुई पिटारा – पाठ का सार

परिचय

यह कविता “जादुई पिटारा” की है। जादुई पिटारा एक ऐसा खास डब्बा है जिसमें से बहुत सारी जादुई और मजेदार चीजें निकलती हैं। जब हम इसे खोलते हैं, तो हर बार कुछ नया और अच्छा दिखता है। ये सभी चीजें हमें बहुत हैरान करती हैं और हमें एक कल्पनाओं की दुनिया में ले जाती हैं जहाँ हर चीज बहुत खास होती है। इस कविता से हमें पता चलता है कि कल्पना करना कितना मजेदार होता है और हर छोटी चीज में भी कुछ नया सीखने को मिलता है। आइए, इसे आसान शब्दों में समझते हैं:

पहला प्रसंग:

एक पिटारा हमने खोला,
उसमें से निकला गप्पू गोला।
गोले पर जब बाँधी सुतली,
लगा नाचने बन कठपुतली।

व्याख्या: यहाँ कवि हमें बता रहे हैं कि जब उन्होंने जादुई पिटारा खोला, तो उसमें से गप्पू गोला नाम की एक गोलाकार गुड़िया निकली। जब इस गुड़िया को एक रस्सी से बाँधा गया, तो वह नाचने लगी मानो वह कठपुतली हो।

दूसरा प्रसंग:

कठपुतली ने गाड़े खूँट,
उसमें निकले नौ सौ ऊँट।
उन ऊँटों पर हुई सवारी,
मिली राह में एक सुपारी।

व्याख्या: कवि कहता है कि कठपुतली ने जमीन में खूंटे गाड़े और वहां से नौ सौ ऊँट निकले। ये ऊँट इतने ज्यादा थे कि उन पर सवारी की जा सकती थी। फिर जब वे ऊँटों पर सवार होकर चले, तो रास्ते में उन्हें एक सुपारी मिली।

तीसरा प्रसंग:

उसी सुपारी को जब काटा,
उसमें निकला नौ मन आटा।
उस आटे पर नारियल फोड़ा,
उसमें निकल पड़ा इक घोड़ा।

व्याख्या: कवि कहता है कि जब उन्होंने सुपारी को काटा, तो उसमें से बहुत सारा आटा निकला, जितना कि नौ मन के बराबर हो। फिर जब उस आटे पर नारियल फोड़ा गया, तो वहां से एक घोड़ा निकला।

चौथा प्रसंग:

घोड़े को जब ऐंड लगाई,
आसमान ले पहुँचा भाई।
पाया वहाँ एक गुब्बारा,
जिस पर छेद हुए थे बारा।

व्याख्या: कवि आगे कहता है कि जब घोड़े को एड़ लगाई गई, तो वह उड़कर आसमान में पहुँच गया। वहाँ उसे एक गुब्बारा मिला, जिसमें बारह छेद थे। 

पाँचवां प्रसंग:

एक छेद पर था इस्टेशन,
जिस पर खड़ा हुआ था इंजन।
उस इंजन को धोया ऐसे,
उसमें निकल पड़े दो भैंसे।

व्याख्या: कवि कहता है कि उन बारह छेदों में से एक छेद पर एक स्टेशन था, जहाँ एक इंजन खड़ा हुआ था। जब उस इंजन को धोया गया, तो उसमें से दो भैंसे निकल आए।

छठा प्रसंग:

भैंसे लाकर जोता खेत,
नाज हुआ बारह सौ सेर।
खा-खा नाज हुए दीवाने,
चले चाल, बेहद मस्ताने।

व्याख्या: अंतिम पंक्तियों में कवि कहता है कि भैंसों को लाकर खेत में जोता गया, जिससे बारह सौ सेर अनाज उगा। फिर जब उस अनाज को खाया गया, तो सभी बहुत खुश और मस्त हो गए।

सारांश

इस कविता के माध्यम से हमने सीखा कि जादुई दुनिया में कुछ भी संभव है और हर चीज़ में कोई न कोई रोचक रहस्य छिपा होता है। यह कविता हमें बताती है कि कल्पना की दुनिया में जाकर हम अपने मन की उड़ान को कितना भी विस्तार दे सकते हैं। अंत में, हमें यह भी सिखने को मिलता है कि हर असंभव सी लगने वाली चीज़ में भी संभावनाएँ छिपी होती हैं और हमें हमेशा नए अनुभवों के लिए खुले रहना चाहिए।

10.  रस्साकशी – पाठ का सार

कविता का परिचय

यह कविता “ज़ोर लगाओ, हेंई सा!” को कन्हैया लाल “मत्त” जी ने लिखा है। इस कविता में समूह में खेलते हुए बच्चों की मस्ती और उनकी मेहनत का चित्रण किया गया है। रस्साकशी खेल के माध्यम से कवि ने बच्चों की एकताजोश, और मेहनत को दर्शाया है। कविता सरल भाषा में लिखी गई है, जो बच्चों को मेहनत और टीमवर्क की सीख देती है।

कविता की व्याख्या

पहला प्रसंग:

“ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!

सीना ताने रहो अकड़ कर,

रस्सा दोनों और पकड़ कर,

तिरछे पड़ कर, कमर जकड़ कर,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: यहाँ कवि बच्चों को खेलते समय सीना तानकर और मजबूती से रस्से को पकड़कर खींचने के लिए कह रहे हैं। वे खेल में पूरी ताकत लगाने और ध्यान से खेलने की प्रेरणा दे रहे हैं।

दूसरा प्रसंग:

खींचो, खींचो, ज़ोर लगाओ,

पैर गड़ा कर, पीठ अड़ाओ,

आड़ी-तिरछी चाल भिड़ाओ,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: इस हिस्से में बच्चों को पैर मजबूती से ज़मीन पर गड़ाने और पूरी ताकत से रस्से को खींचने का तरीका बताया गया है। कवि खेलते समय आड़ी-तिरछी चाल से जीतने की कोशिश की बात कर रहे हैं।

तीसरा प्रसंग:

“रस्सा नहीं फिसलने पाए,

साथी नहीं बिचलने पाए,

जोश-खरोश न ढलने पाए,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: यहाँ कवि बच्चों को यह समझाते हैं कि खेल में रस्से को मजबूती से पकड़कर रखना जरूरी है ताकि वह फिसल न सके। साथी खिलाड़ियों को भी ध्यान से खेलना चाहिए ताकि कोई गड़बड़ न हो। कवि बच्चों को जोश और उत्साह बनाए रखने की बात करते हैं, ताकि वे खेल में पूरी शक्ति से लगे रहें।

चौथा प्रसंग:

“हुए पसीने से तर सारे,

सफल हुए सब दाँव करारे,

इधर हमारे, उधर तुम्हारे,

ज़ोर लगाओ, हेंई सा!

हेंई सा! भाई, हेंई सा!”

व्याख्या: कवि बच्चों की मेहनत का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सबके पसीने से तर हो जाने के बाद भी वे हार नहीं मानते। हर दांव पर जीतने की कोशिश होती है और एक-दूसरे को टक्कर देने का हौसला दिखाते हैं।

कविता का सारांश

इस कविता में बच्चों के खेल रस्साकशी का शानदार चित्रण किया गया है। कवि ने मेहनतएकता, और जोश को बड़े सरल और मजेदार तरीके से प्रस्तुत किया है। यह कविता बच्चों को मिलकर काम करने और अपनी पूरी ताकत लगाने की प्रेरणा देती है।

09. प्रकृति पर्व – फूलदेई – पाठ का सार

कहानी का परिचय

यह कहानी जानकी और उसके दोस्तों की है जो उत्तराखंड के प्रसिद्ध त्योहार ‘फूलदेई’ को मनाने के लिए तैयार हो रहे थे। फूलदेई बच्चों द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक पर्व है, जो वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक होता है। इस दिन बच्चे फूलों की डलियों में फूल एकत्रित करते हैं और घर-घर जाकर समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।

कहानी की व्याख्या

जानकी बहुत खुश थी क्योंकि अगले दिन वह अपने दोस्तों के साथ फूलदेई पर्व मनाने जाने वाली थी। उसकी माँ ने उसे सुबह जल्दी उठा दिया। नहाने के बाद, वह अपनी छोटी डलिया लेकर फूल चुनने निकल पड़ी। आँगन में पहुँचते ही उसने हेमा, गीता, राधा, बीर, गोविंद और मनोज को बुलाया। सभी दोस्त अपनी-अपनी डलियाँ लेकर जंगल की ओर फूल चुनने चले गए।

फूलदेई उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध त्योहार है, जिसे खासकर बच्चे मनाते हैं। इसलिए इसे ‘बाल पर्व‘ भी कहा जाता है। यह त्योहार चैत्र मास की संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जो हिन्दू नववर्ष का पहला महीना होता है। फूलदेई वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। इस समय पहाड़ियों की बर्फ पिघलने लगती है और सर्दियों का अंत हो जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ फूलों से भर जाते हैं।

जानकी और उसके दोस्तों ने बुराँस, फ्योंली और अन्य प्रकार के फूल अपनी डलियों में भर लिए। अब यह टोली, जिसे ‘फूलारी’ कहा जाता है, हर घर के मुख्य दरवाजे पर जाकर अक्षत और फूल चढ़ाती है और गीत गाती है—

फूल देई, छम्मा देई,
दैणी द्वार, भर भकार
ये देली कैं बार-बार नमस्कार
फूले द्वार…

इसका अर्थ है, “आपकी देहली फूलों से भरी रहे, सब मंगलकारी हो, सभी को क्षमा मिले, सभी की रक्षा हो, और घर में समृद्धि बनी रहे। अन्न के भंडार भरे रहें।”  सभी घरों में फूलारी के स्वागत की तैयारी की जाती है। घरों को साफ-सुथरा करके देहली को गोबर-मिट्टी से लीपा जाता है। जब फूलारी आशीर्वाद देते हुए गाती है, तब घरों से उन्हें चावल, गुड़ और पैसे दिए जाते हैं। जानकी और उसके दोस्त दिनभर यह काम करते हुए थक जाते हैं, लेकिन वे बहुत खुश होते हैं।

फूलदेई का यह त्योहार उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में आठ दिन से लेकर एक महीने तक चलता है। बच्चे जो चावल और गुड़ इकट्ठा करते हैं, उससे हलवा, छोई, साई और पापड़ी जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं। जमा पैसों से घी या तेल खरीदा जाता है, और फिर ये व्यंजन सभी मिलकर खाते हैं।  फूलदेई बच्चों को बचपन से ही प्रकृति से प्यार और सामाजिक एकता की सीख देता है। यह त्योहार लोकगीतों, परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है। साथ ही, यह पर्व हमें अपनी संस्कृति और प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

कहानी का सारांश

यह कहानी हमे सिखाती है कि हमें प्रकृति से प्रेम और सामाजिक एकता को बनाए रखना चाहिए। त्योहारों के माध्यम से हम परंपराओं से जुड़ते और खुशियाँ बाँटते हैं।

08. चतुर गीदड़ – पाठ का सार

कहानी का परिचय

इस कहानी में एक चतुर गीदड़ और भूखे मगरमच्छ की कहानी बताई गई है। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कभी-कभी अपनी चतुराई से बड़ी समस्या से बचा जा सकता है। साथ ही, यह भी दिखाती है कि गलतफहमी और लालच से किसी को नुकसान हो सकता है।

कहानी की व्याख्या

पहला दृश्य: तालाब का किनारा

मगरमच्छ तालाब के किनारे बैठा सोच रहा है कि उसने सारी मछलियाँ खा ली हैं और अब खाने को कुछ नहीं बचा है। उसे बहुत भूख लगी है। वह सोचता है कि अगर गीदड़ मिल जाए तो उसकी भूख मिट सकती है, लेकिन गीदड़ बहुत चतुर है और आसानी से पकड़ में नहीं आता। 

तभी उसका मित्र कछुआ आता है और उससे उसकी उदासी का कारण पूछता है। मगरमच्छ बताता है कि वह भूख से परेशान है और गीदड़ को खाना चाहता है। कछुआ कहता है कि गीदड़ को पकड़ना कठिन है, लेकिन वह मदद करने को तैयार है। वह मगरमच्छ के कान में एक योजना बताता है, जिससे गीदड़ को फँसाया जा सके।

दूसरा दृश्य: तालाब का किनारा

मगरमच्छ मरा हुआ बनकर तालाब के किनारे लेट जाता है और कछुआ उसके पास खड़ा होता है। दूर से गीदड़ आता दिखता है। कछुआ दुखी होकर कहता है, “हाय! मेरे प्यारे मित्र मगरमच्छ के प्राण निकल गए। अब मैं अकेला रह गया हूँ।”

गीदड़  पास आकर पूछता है कि क्या हुआ। कछुआ बताता है कि मगरमच्छ मर गया है। गीदड़ मन ही मन खुश होता है कि अब वह बिना डर के तालाब का पानी पी सकेगा। कछुआ उससे मदद मांगता है कि वे मिलकर मगरमच्छ के ऊपर सूखे पत्ते डालकर उसे ढक दें। 

गीदड़ शक करता है और कहता है कि उसने सुना है कि मरे हुए मगरमच्छ की पूँछ हिलती रहती है। वह मगरमच्छ को ध्यान से देखने लगता है। तभी मगरमच्छ की पूँछ हिलती है। गीदड़ समझ जाता है कि यह एक चाल है। वह तेजी से वहाँ से भाग जाता है। कछुआ मगरमच्छ से कहता है कि गीदड़ बहुत चतुर है और वे उसकी चाल में आ गए। अब उसे पकड़ना और भी कठिन होगा।

कहानी का सारांश

यह कहानी हमें सिखाती है कि चालाकी से किसी को मूर्ख बनाना आसान नहीं होता। गीदड़ की समझदारी और मगरमच्छ का लालच दोनों ही कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इस कहानी के माध्यम से बच्चों को सिखाया जाता है कि किसी भी परिस्थिति में हिम्मत न हारना और बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए। गीदड़ की चतुराई ने न केवल उसे अपने शिकारियों से बचाया, बल्कि यह भी सिखाया कि बुद्धिमत्ता और समझदारी से कैसे किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। 

यह कहानी बच्चों को प्रेरित करती है कि वे जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना बुद्धिमानी और चतुराई से करें।

07. मित्र को पत्र – पाठ का सार

कहानी का परिचय

यह कहानी एक पत्र के रूप में है, जिसे रूपम नाम का बच्चा अपने मित्र अभिषेक को लिखता है। इसमें वह अपनी गर्मी की छुट्टियों की यात्रा के बारे में बताता है।

कहानी का सारांश

रूपम ने अपने दोस्त अभिषेक को नमस्ते कहा और पूछा कि वह और उसका परिवार ठीक-ठाक है या नहीं। रूपम ने लिखा कि वह गर्मी की छुट्टियाँ मनाने अपने नाना-नानी के घर गुवाहाटी आया है।

गुवाहाटी असम का एक बड़ा और सुंदर शहर है। यह ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा है। यह नदी बहुत चौड़ी है और इसमें माजुली नाम का एक द्वीप स्थित है। माजुली भारत का सबसे बड़ा नदी में बना द्वीप है।

माजुली में रूपम ने एक मठ देखा, जहाँ लोग भगवान की पूजा करते हैं। वहाँ उसने सत्रिया नृत्य भी देखा, जो असम के प्रसिद्ध नृत्यों में से एक है। रूपम ने कामाख्या मंदिर भी देखा, जो एक पर्वत पर बना है। वहाँ बहुत से लोग पूजा करने आते हैं। वह उमानंद मंदिर भी गया, जहाँ पहुँचने के लिए नाव में बैठना और थोड़ा पैदल चलना पड़ता है।

चलते समय नानी ने रूपम को बताया कि खेलना बहुत जरूरी है। खेलने से शरीर स्वस्थ रहता है और पढ़ाई भी अच्छे से होती है। रूपम ने बताया कि वह अपने दोस्तों के साथ खो-खो, पिट्ठू, क्रिकेट और फुटबॉल खेलता है।

खेल की बात करते ही रूपम को अभिषेक की याद आ गई। उसने लिखा कि वह जल्दी लौटेगा और उसे अपने सारे अनुभव बताएगा। अंत में रूपम ने सभी बड़ों को प्रणाम किया।

कहानी से शिक्षा

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि छुट्टियाँ केवल आराम करने के लिए नहीं होतीं, बल्कि नई जगहों को देखने और वहाँ की चीज़ों को जानने का अच्छा समय भी होती हैं। यात्रा करने से हमारा ज्ञान बढ़ता है और हम नए-नए अनुभव हासिल करते हैं। इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलना भी बहुत जरूरी है, क्योंकि खेलों से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है और मन भी खुश रहता है। साथ ही हमें अपने दोस्तों और परिवार के साथ अपने अनुभव बाँटने चाहिए, जिससे हमारे रिश्ते और भी मजबूत होते हैं।

शब्दार्थ

  • सकुशल: ठीक-ठाक, सुरक्षित
  • महानगर: बड़ा शहर
  • द्वीप: चारों ओर पानी से घिरी ज़मीन
  • विश्वप्रसिद्ध: पूरी दुनिया में प्रसिद्ध
  • मठ: साधुओं का पूजा-स्थान
  • श्रद्धालु: भगवान को मानने वाले लोग
  • दर्शन: मंदिर जाकर भगवान को देखना
  • आवश्यक: ज़रूरी
  • सत्रिया नृत्य: असम का पारंपरिक नृत्य

06. बीरबल की खिचड़ी – पाठ का सार

परिचययह कहानी अकबर और उनके बुद्धिमान दरबारी बीरबल की है। बीरबल अपनी समझदारी के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। इस कहानी में एक गाँव के व्यक्ति को अकबर ने एक चुनौती दी, और बीरबल ने अपनी चतुराई से उस व्यक्ति की मदद की, जिससे अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ।

व्याख्या

कहानी की शुरुआत अकबर के दरबार से होती है, जहाँ अनेक विद्वान और बुद्धिमान लोग होते थे। बीरबल उनमें से एक थे, जिन्हें अपनी चतुराई और बुद्धिमत्ता के लिए विशेष रूप से जाना जाता था। यह उनकी चतुराई ही थी जो अक्सर बादशाह अकबर को भी प्रभावित करती थी। 

एक सर्दी के दिन, जब अकबर एक गाँव से गुजर रहे थे, उन्होंने एक व्यक्ति को यह कहते सुना कि वह यमुना नदी के पानी में रातभर खड़ा रह सकता है। अकबर ने उसे चुनौती दी कि यदि वह ऐसा कर पाता है, तो उसे थैलीभर मोहरें इनाम में देंगे।

वह व्यक्ति अपनी बात पर कायम रहा और ठंडे पानी में पूरी रात खड़ा रहा। अगली सुबह, वह बादशाह के दरबार में पहुंचा और अपनी चुनौती की सफलता की बात कही और बताया कि वह महल से आने वाले दीपक की रोशनी देखकर सारी रात खड़ा रहा। अकबर ने सोचा कि दीपक की रोशनी से उसे ठंड का एहसास कम हुआ होगा, इसलिए उसे इनाम नहीं दिया। वह व्यक्ति निराश हो गया। 

बीरबल ने इस अन्याय को देखा और एक चतुराई भरा तरीका निकाला। वे दरबार में नहीं आए और जब बादशाह ने उन्हें बुलाया, तो उन्होंने कहा कि वे खिचड़ी पका रहे हैं। अकबर जब बीरबल के घर पहुंचे तो देखा कि बीरबल ने एक लंबे बाँस पर हाँडी लटका रखी है और बहुत नीचे आग जल रही है। बीरबल ने तर्क दिया कि यदि वह व्यक्ति दीपक की गरमी से सारी रात पानी में खड़ा रह सकता है, तो इस आग से उनकी खिचड़ी क्यों नहीं पक सकती। अकबर को बीरबल की बात समझ में आ गई, और उन्होंने अपनी गलती मानी और उस व्यक्ति को उसका उचित इनाम दिया। 

सारांश

यह कहानी हमें न्याय, समझदारी, और चतुराई का महत्व सिखाती है। यह दिखाती है कि कैसे बुद्धिमत्ता और चतुराई से कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है और सही को सही साबित किया जा सकता है। 

05. आम का पेड़ – पाठ का सार

परिचय

इस अध्याय में एक लड़के सौरभ की कहानी बताई गई है, जो अपने बगीचे में आम का पौधा लगाता है और उसकी देखभाल करता है। कहानी के माध्यम से यह सिखाया गया है कि धैर्य और देखभाल से किसी भी छोटे पौधे को बड़ा पेड़ बनाया जा सकता है। 

व्याख्या

गर्मियों के दिन थे जब सौरभ के चाचाजी ने उसे अपने बगीचे से एक टोकरी भर आम भेजे। आम बहुत मीठे थे, और सौरभ को वे बेहद पसंद आए। उसने यह सोचा कि वह अपने बगीचे में भी ऐसे ही आम उगाएगा। 

सौरभ ने बगीचे में मिट्टी खोदकर एक आम की गुठली बोई। उसने उस पर मिट्टी डालकर पानी छिड़का और हर रोज़ पानी डालता रहा। कुछ दिनों तक पौधा नहीं निकला, जिससे निराश होकर उसने पानी डालना बंद कर दिया। 

एक दिन जब हल्की बारिश हो रही थी, सौरभ बगीचे में गया और देखा कि उस जगह पर एक नन्हा-सा पौधा निकल आया था, जिसमें लाल-लाल कोंपलें थीं। यह देख सौरभ बहुत खुश हुआ और उसने अपनी बहन प्रिया को भी बुलाया। दोनों भाई-बहन पौधा देखकर बहुत खुश हुए। 

सौरभ ने प्रिया को बताया कि यह आम का पौधा है और इसमें एक दिन मीठे आम लगेंगे। दोनों उत्साहित होकर पिताजी के पास पहुंचे और उन्हें यह खुशखबरी दी। पिताजी ने बताया कि इस छोटे पौधे को बड़ा होने में चार-पांच साल लगेंगे। तब जाकर यह पेड़ बनेगा और इसमें आम लगेंगे। यह सुनकर प्रिया थोड़ी उदास हो गई, पर सौरभ ने कहा कि वह इस पौधे की देखभाल करेगा और एक दिन वे अपने बगीचे के आम जरूर खाएंगे।

सारांश

यह कहानी धैर्य, मेहनत और देखभाल का महत्व बताती है। पौधों की तरह ही, जीवन में भी किसी चीज़ को बड़ा करने के लिए समय और देखभाल की आवश्यकता होती है।